भारत ठुकरा सकता है हसीना के प्रत्यर्पण की मांग , मिल गई दोस्त को बचाने की कुंजी
दिल्ली : भारत को बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को बचाने की ‘कुंजी’ मिल गई है। वह बांग्लादेश के हसीना के प्रत्यर्पण की मांग को ठुकरा सकता है। भारत और बांग्लादेश के बीच 2013 की एक प्रत्यर्पण संधि हुई थी, जिसमें ऐसी दो अचूक धाराएं हैं, जिनकी आधार पर वह साफ तौर पर बांग्लादेश को मना कर सकता है। बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने शेख हसीना को ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ का दोषी पाते हुए फांसी की सजा सुनाई है। ट्रिब्यूनल के 17 नवंबर को दिए इस फैसले में पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को भी मौत की सजा हुई है। वहीं, तीसरे आरोपी पूर्व IG पुलिस चौधरी अब्दुल्ला अल-ममून को 5 साल की सजा सुनाई गई है। 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना ने पद से इस्तीफा देकर बांग्लादेश छोड़ दिया था। पिछले 15 महीनों से वे दिल्ली के एक सेफ हाउस में रह रही हैं। अब बांग्लादेश भारत से हसीना को सौंपने की मांग कर रहा है। एक्सपर्ट से जानते हैं 2013 की भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि के बारे में और यह भी समझेंगे कि भारत के पास क्या हैं रास्ते।
बांग्लादेश को भारत ने क्या कहा
नवभारत टाइम्स की एक खबर के अनुसार, बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत सरकार से शेख हसीना को बांग्लादेश को सौंपने को कहा। मानवता के विरुद्ध अपराधों के दोषी इन व्यक्तियों को शरण देना किसी भी अन्य देश के लिए अमित्र व्यवहार का गंभीर उल्लंघन और न्याय का उपहास होगा। हम भारत सरकार से इन दोनों दोषियों को तुरंत बांग्लादेशी अधिकारियों को सौंपने का आग्रह करते हैं। वहीं, भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि एक निकट पड़ोसी होने के नाते भारत बांग्लादेश के लोगों के सर्वोत्तम हितों के लिए प्रतिबद्ध है। जिसमें उस देश में शांति, लोकतंत्र, समावेशिता और स्थिरता शामिल है। हम इस दिशा में सभी हितधारकों के साथ हमेशा रचनात्मक रूप से जुड़े रहेंगे।
भारत के पास एक नहीं दो-दो ब्रह्मास्त्र
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन के मामलों पर नजर रखने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, भारत और बांग्लादेश के बीच 2013 में एक प्रत्यर्पण संधि हुई थी। इसकी धाराएं 6 और 8 दो ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं, जो भारत को इस संधि के तहत बांग्लादेश के प्रत्यर्पण के अनुरोध को ठुकराने का अधिकार देता है। शेख हसीना को बिना उनका पक्ष जाने फैसला सुनाना वैसे भी कानूनी तौर पर गलत है। खासतौर पर फांसी की सजा के मामलों में ऐसे आरोपी या दोषी को फिजिकली उस देश की अदालत में मौजूद होना जरूरी होता है।
