विश्व हिन्दी दिवस: आवश्यकता है अवधारणात्मक शुद्धता एवं संस्कृत की ओर लौटने की

सोनाली मिश्रा

आज विश्व हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है। जब भी हम हिन्दी की बात करते हैं तो एक ऐसा भाव हमारे दिलों में भर दिया जाता है कि जैसे हिन्दी में बात करना एक पिछड़ेपन का प्रतीक है। एक समय ऐसा था जब हिन्दी में बात करने का अर्थ होता था कि जैसे दूसरे व्यक्ति को अंग्रेजी नहीं आती है। हिन्दी को बेकार भाषा बनाया गया और यहाँ तक कहा गया कि हिन्दी की लिपि ही रोमन कर देते हैं।

परन्तु यह सब हो किस कारण रहा था? क्या हिन्दी को सरकारी हिन्दी बना दिया था इस कारण हिन्दी की ग्राह्यता कम हो गयी थी? क्या हिन्दी के साथ कोई षड्यंत्र खेला जा रहा था? यह प्रश्न रह रह कर इस कारण उभरते हैं क्योंकि यह देखा गया कि लोक की हिन्दी तो समृद्ध रही या वह हिन्दी जो विविध मंचो से बोली जा रही थी वह अपने समृद्ध रूप में थी, उसे लोग समझ रहे थे और लोग गा भी रहे थे, परन्तु फिर वह कौन सी हिन्दी थी जिसे लेकर यह कहा जा रहा था कि हिन्दी मर रही है, हिन्दी को पढ़ा नहीं जा रहा है! वामपंथी या कहें सरकारी बाबू लोगों की लॉबी यह प्रचार कर रही थी कि हिन्दी भाषा मर गयी है। लगभग हर हिन्दी दिवस पर यही राग अलापा जाता रहा और सरकारी रूप से कथित रूप से हिन्दी को बचाने के लिए उसे सरल, सरल और सरल करने का प्रयास किया जाने लगा।

हिन्दी के साथ सरलीकरण के नाम पर जो खेल खेला गया, उसने हिन्दी को अवधारणात्मक रूप से हानि पहुंचाई। उसकी संस्कृतनिष्ठ या हिन्दू लोक के साथ जुड़ी पहचान को नष्ट करके उसे ऐसी भाषा में परिवर्तित करने का षड्यंत्र रचा जिसमें केवल फारसी या अरबी मूल वाली उर्दू शब्दों की भरमार थी।

लोक भाषा को गंवार या कहें पिछड़ी कहा जाने लगा और सरकारी को उर्दू में भरमार वाली भाषा बना दिया जा रहा था। यह कैसा खेल खेला जा रहा था? क्या यह एक जीवंत भाषा को अवचेतन से नष्ट करने का कोई खेल था? यह कहा गया कि संस्कृत में प्रेम नहीं है, या संस्कृत में लोरी ही नहीं गाई जा सकती है? ऐसा विमर्श क्यों बनाया गया? क्या हिन्दी से संस्कृतनिष्ठ शब्दों को हटाने के लिए?

हिन्दी को सरल बनाने के नाम पर उसमें तमाम तरह के अंग्रेजी शब्दों की भरमार कर दी गई। उसमें उर्दू की भरमार कर दी गयी और हिन्दी बोलने वालों को फिल्मों में भी या तो खलनायक या फिर विदूषक के रूप में दिखाया जाने लगा। फिर से प्रश्न यही है कि अंतत: हिन्दी को विदूषक की भाषा क्यों बनाया जा रहा था? हिन्दी बोलने वाला नायक पिछड़ा होता था और अंग्रेजी बोलने वाला या उर्दू बोलने वाला प्रोग्रेसिव या फिर तरक्कीपसंद! और यह सब हिन्दी फिल्मों, हिन्दी साहित्य और हिन्दी के विकास के नाम पर किया जा रहा था।

हिन्दी की आत्मा अर्थात संस्कृतनिष्ठ शब्दों को जानबूझकर क्लिष्ट बना दिया गया। कई शब्द जिनकी अवधारणा ही हिन्दुओं का विरोध या हिन्दू धर्म के प्रतिकूल थी उन्हें आम बोलचाल के नाम पर उस हिन्दी में सम्मिलित कर दिया गया जो मूलत: हिन्दू ही बोलते थे क्योंकि उर्दू पर तो मुस्लिमों ने 1800 के लगभग से अपना अधिकार स्थापित कर दिया था।

विश्व में किसी भी भाषा के सरलीकरण की इतनी बहस नहीं होती है जितनी बहस हिन्दी के सरलीकरण को लेकर होती है। क्योंकि किसी भी भाषा का सरलीकरण हो ही नहीं सकता है! परन्तु हिन्दी के सरलीकरण का षड्यंत्र रचा गया, वहीं सरलीकरण के आग्रही लोगों से यह तो प्रश्न किया ही जाना चाहिए था कि अंतत: उन्हें सरलीकरण किसके लिए चाहिए? क्योंकि यदि लोक भाषा में सरलीकरण चाहिए था तो रामचरित मानस जैसा ग्रन्थ है, जिसने लोकप्रियता एवं जनस्वीकार्यता की हर सीमा पार कर दी है तो वहीं वाल्मीकिकृत रामायण भी है, जिसकी स्वीकार्यता भी उतनी ही है।

हिन्दी में साहित्य में भी जहां जयशंकर प्रसाद को पढ़ने वाले लोग हैं तो वहीं प्रेमचन्द को भी, परन्तु गोदान एवं स्वर्ग के खंडहर में की भाषा में अंतर है। क्या जयशंकर प्रसाद की कहानियों को भी सरल करके पढ़ाया जाएगा?

क्या यह संभव है कि किसी व्यक्ति को सरलीकरण एवं सर्वग्राह्यता के नाम पर ऐसा बना दिया जाए कि उसके हाथ, पैरों, सिर, बाल आदि आदि को किसी दूसरे के अनुकूलन में काट छांट दिया जाए?

इससे क्या होगा, वह व्यक्ति ही विदूषक बन जाएगा! हिन्दी को किसके लिए सरलीकरण के मार्ग पर धकेलना था? क्यों हिन्दी को विदूषक बनाया गया? जो अरबी फारसी के रसिया हैं, वह उन्हीं के वर्चस्व वाली उर्दू पढेंगे, जिन अंग्रेजी बोलने वाले अधिकारी गणों को हिन्दी पढ़ना मानसिक पिछड़ापन लगता है वह अंग्रेजी ही पढेंगे और जिन्हें औपनिवेशिक मानसिकता के चलते ही हिन्दी नहीं पढ़नी है, वह नहीं पढ़ेंगे, तो फिर ऐसा क्या है कि हिन्दी का सरलीकरण आवश्यक था?

हिन्दी को इसी सरलीकरण की हठ ने लगभग मृतप्राय अवस्था में पहुंचा दिया था। मजे की बात यह है कि सरलीकरण के नाम पर अरबी और फारसी या अंग्रेजी शब्द तो भरने का कुप्रयास हुआ, परन्तु ब्रज, अवधी, आदि लोक भाषाओं के शब्द कठिन या पिछड़े माने जाने लगे! यह कैसी मानसिक विकृति से भरने का प्रयास किया जाने लगा था?

हिन्दी की पहचान उसकी संस्कृतनिष्ठ जड़े हैं क्योंकि वही उसे भारत से जोड़ती हैं। वह उसे उसकी आत्मा से जोड़ती हैं। हिन्दी में हिन्दुस्तानी के नाम पर व्यर्थ में नुक्ता लगाने का कुप्रयास किया गया। भारत की सभी भाषाएँ संस्कृतनिष्ठ हैं क्योंकि सभी का मूल संस्कृत हैं। संस्कृत ही भारत के धर्म, दर्शन, भूगोल, खगोलशास्त्र, इतिहास आदि की भाषा संस्कृत ही रही है। अत: हिन्दी में कुछ भी लिखा जाएगा तो अवधारणात्मक रूप से संस्कृतनिष्ठ ही शब्द आएँगे।

हाँ, जहां पर तहजीब बदलेगी अर्थात जहां पर ऐसे शब्द चाहिए होंगे जिनकी अवधारणा ही हिन्दी या संस्कृत नहीं है तो वहां पर बाहरी भाषाएँ ही प्रयोग में लाई जाएँगी। जैसे ईमानदारी शव्द का अर्थ प्रचलित सन्दर्भों में या कहें सरलीकरण के नाम पर हिन्दी में प्रयोग कर लिया जाता है, परन्तु वह एक विशेष ही सन्दर्भ में प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि वह मजहब विशेष का ही शब्द है और विशेष अवसर के लिए है! ईमानदार के स्थान पर हिन्दी में इसे सत्यनिष्ठ कहा जाना चाहिए।

ऐसे ही दावत का अर्थ भी एकदम प्रचलित सन्दर्भ या सरलीकरण से एकदम पृथक है। इसके लिए हिन्दी में भोज का प्रयोग किया जाना चाहिए। अत: यह आवश्यक है कि हिन्दी के सरलीकरण के नाम पर वह शब्द तो हिन्दी का हिस्सा नहीं बने जा रहे हैं, जो हिन्दी की मूल अवधारणा के ही विपरीत हैं।

अंग्रेजी के भी अवधारणात्मक या फिर कहें परिभाषी या तकनीकी शब्दों को ज्यों का त्यों लिया जाना चाहिए, क्योंकि उनका भाषांतरण संभव ही नहीं है। जैसे स्टेशन, ट्रेन, इंजन, कंप्यूटर, डीजल, आदि! परन्तु जहाँ पर हिन्दी के शब्द उपलब्ध हैं तो ऐसे में उन शब्दों को दैनिक जीवन में क्यों प्रयोग करना जो हिन्दी की भारतीय पहचान से एकदम भिन्न हैं।

यहाँ पर यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि हिन्दी में मात्र बाहरी भाषाओं अर्थात जिनकी अवधारणा ही हिन्दी के हिन्दू एवं भारतीय स्वरुप से भिन्न है, उन्हीं से अवधारणात्मक शब्दों के स्थानापन्न शब्दों का विरोध है, किसी भी भारतीय भाषा से नहीं, क्योंकि हर भारतीय भाषा का मूल संस्कृत ही है। भारत की किसी भी भाषा में विवाह का अर्थ विवाह ही रहेगा, प्रभु श्री राम का अर्थ प्रभु श्री राम ही रहेगा, हनुमान का अर्थ हनुमान ही रहेगा, चरण कमल का अर्थ चरण कमल ही रहेगा, एवं यदि हिन्दी को सरलीकरण के लिए शब्द प्रयोग करना ही है तो वह भारतीय भाषाओं से लेकर समृद्ध हो एवं सरल हो!

सरलीकरण के नाम पर हिन्दी को संस्कृत से दूर करने का जो षड्यंत्र किया गया, उससे हिन्दी का ही ह्रास नहीं हुआ बल्कि हिन्दी के प्रति एक अजीब सी कुंठा ने जन्म ले लिया। इसलिए आवश्यक है कि हिन्दी के सरलीकरण के नाम पर तहजीब एवं कल्चर वाले शब्दों का प्रयोग न किया जाए, क्योंकि शब्द जब word बनता है तो letters के संयोजन तक ही सीमित हो जाता है, परन्तु जब वह शब्द होता है तो वह ब्रह्म की अनुभूति होता है।

जैसे ही शब्द के स्थान पर word का प्रयोग किया जाता है, वह सीमित और संकुचित हो जाता है। अत: जब सरलीकरण के नाम पर बाहरी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग किया जाएगा तो वह हिन्दी को संकुचित और सीमित एवं आत्मा से हीन निर्जीव भाषा कर देगा, जैसा पूर्व में करने का प्रयास किया गया एवं हिन्दी फिल्मों के माध्यम से अभी तक किया जा रहा है।

विश्व हिन्दी दिवस पर आवश्यक है कि यह समझा जाए कि हिन्दी को यदि सुरक्षित, सरल, बोधगम्य एवं सहज रखना है तो सरलीकरण के नाम पर थोपे गए अवधारणात्मक रूप से विरोधी शब्दों को हटाकर उसकी संस्कृतनिष्ठ पहचान को वापस लाना होगा।

जैसे “प्रभु की इच्छा” जहां हिन्दू धर्म की अवधारणा वाला शब्द है तो वहीं “ऊपर वाले की मर्जी” इस अवधारणा का कि जो शक्ति है वह ऊपर या जन्नत में रहता है। हिन्दुओं में तो कण कण में प्रभु का वास है। जैसे जल का सरलीकरण वाटर नहीं हो सकता! जैसे गुरु अलग है, टीचर अलग है! यह समझना ही होगा कि जब से हिंदी को सुगम बनाने के लिए उर्दू निष्ठ शब्दों को जोड़ा जाने लगा तब से और भी ज्यादा समस्या का विस्तार हुआ। क्योंकि उर्दू का विकास भले ही भारत में हुआ, परन्तु वह कई अर्थों में वर्तमान में भारत की भाषा नहीं है। वह मजहब विशेष की भाषा बन गयी थी और इस आशय की पीड़ा आचार्य रामचंद्र शुक्ल भी व्यक्त कर चुके हैं!

इस विषय में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य का इतिहास नामक अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि

इसका तात्पर्य यह है कि संवत 1800 तक आते आते मुसलमान हिन्दी से किनारा खींचने लगे थे। हिन्दी हिन्दुओं के लिए छोड़कर अपने पढ़ने-लिखने की भाषा वह विदेशी अर्थात फारसी ही रखना चाहते थे। जिसे उर्दू कहते हैं।

दुःख की बात यह है कि उसमें कई शब्द ऐसे हैं जो अंतत: भारत के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। जैसे काफिर, जंग, ईमान, ईमानदारी आदि। बहुधा बाज़ार के दबाव के कारण उर्दूनिष्ठ शब्दों का प्रयोग करना पड़ जाता है, परन्तु honest का सच्चा अर्थ ईमानदार नहीं हो सकता। ईमान पूर्णतया मजहबी है। जो भी व्यक्ति ईमानदार शब्द का प्रयोग honest के लिए करता है, वह पूर्णतया अनुचित प्रयोग करता है। हिंदी में honest का स्थानापन्न होगा सत्यवादी या निष्कपट।

ईमान वाला व्यक्ति अर्थात जिसने इस्लाम को मन और वचन दोनों से अंगीकार कर लिया है, उसे honest के अर्थ में कैसे और किस सन्दर्भ में प्रयोग किया जा सकता है, यह एक प्रश्न है।

हिंदी में सरलीकरण के नाम पर जो भी उर्दू के शब्द ठूंसे गए, उनका दुष्परिणाम आप नई पीढ़ी पर देखिये, जिसे काफिर शब्द सहज लगता है, जिसे प्रतिमाओं को तोड़ना बहुत सामान्य प्रतीत होता है। हिंदी के साथ की गयी इस घुसपैठ को हर मूल्य पर रोकना होगा। हमारे आपके जीवन में जो विधर्मी शब्द अतिक्रमण करके स्थापित हो चुके हैं, उन्हें हटाना होगा। बच्चों को यह समझाना ही होगा कि इश्क, लव और प्रेम तीनों एक ही नहीं है। प्रेम व्यापक है, इश्क जिस्मानी है और लव, वह तो जैसे लस्ट (lust) का ही पर्याय आजकल बन गया है।

विश्व हिन्दी दिवस पर लौटना होगा अपने मूल पर, अपनी हिन्दी पर जिसकी जड़ें संस्कृत में हैं, जिसकी जड़ें भारत में हैं!

(यह स्टोरी हिंदू पोस्ट की है और यहाँ साभार पुनर्प्रकाशित की जा रही है.)

(यह आलेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों, दृष्टिकोणों और तर्कों को व्यक्त करता है। कॉलम और लेखों में व्यक्त किये गये विचार किसी भी तरह से टाउन पोस्ट, इसके संपादक की राय या इसकी संपादकीय नीतियों या दृष्टिकोण को इंगित नहीं करते हैं.)

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