गुवा गोलीकांड बरसी : शहीदों के बलिदान को नमन, राज्य निर्माण की नींव को याद किया गया


चाईबासा (प. सिंहभूम)। झारखंड आंदोलन के इतिहास में अमिट और काले अध्याय के रूप में दर्ज गुवा गोलीकांड की बरसी पर सोमवार को शहीद स्थल पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

इस अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता व पूर्व विधायक कुणाल षाडंगी और खरसावां विधायक दशरथ गगराई समेत कई नेता और भारी संख्या में लोग उपस्थित थे।

सभी ने शहीदों की स्मृति में पुष्प अर्पित कर नमन किया और आंदोलन में उनके योगदान को याद किया।

श्रद्धांजलि व संकल्प
कुणाल षाडंगी ने अपने संबोधन में कहा कि 8 सितंबर 1980 को गुवा में निर्दोष आंदोलनकारियों पर हुई गोलीबारी में कई लोग शहीद हुए थे। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया, बल्कि उसी ने झारखंड आंदोलन को नई ऊर्जा दी और राज्य निर्माण की नींव को मजबूत किया। उन्होंने कहा कि गुवा गोलीकांड झारखंड की अस्मिता और अधिकार की लड़ाई का प्रतीक है। शहीदों के बलिदान ने हमें संघर्ष की शक्ति दी। अब हमारा कर्तव्य है कि उनके सपनों का झारखंड बनाएं – एक ऐसा राज्य जहाँ न्याय, समानता और युवाओं को अवसर मिले।

उन्होंने आगे कहा कि आने वाली पीढ़ियां इन शहीदों को हमेशा प्रेरणा स्रोत के रूप में देखेंगी। झारखंड मुक्ति मोर्चा शहीदों और उनके परिवारों के सम्मान के लिए सदैव प्रतिबद्ध रहेगा।

अर्जुन मुंडा ने किया नमन
पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने भी शहीद स्थल पर पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि गुवा गोलीकांड केवल झारखंड ही नहीं, पूरे देश के लिए लोकतांत्रिक संघर्ष का प्रतीक है। शहीदों का बलिदान हमें हमेशा यह याद दिलाता रहेगा कि अधिकारों और पहचान की लड़ाई में एकजुटता और साहस की कितनी अहमियत होती है।

जनसहभागिता
श्रद्धांजलि सभा में बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण, समाज के लोग और झामुमो कार्यकर्ता उपस्थित थे। सभी ने शहीदों को याद करते हुए मौन धारण किया और उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान झारखंड आंदोलन के पुराने गीत भी गाए गए, जिससे वातावरण भावुक हो उठा।

गुवा गोलीकांड : झारखंड आंदोलन का टर्निंग प्वाइंट
ज्ञात हो कि 8 सितंबर 1980 को पश्चिम सिंहभूम के गुवा खदान क्षेत्र में हज़ारों मजदूर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में कई निर्दोष मजदूर शहीद हो गए। उनमें प्रमुख रूप से शामिल थे – दुखन मुंडा, रघुनाथ नायक, बबलू लोहरा, चंद्रमा पहाड़िया, रामलाल उरांव, शिवलाल मुंडा, पन्नालाल हांसदा, जगदीश पहान, बंसीलाल नायक, देवमनी मुर्मू और एक अन्य अज्ञात मजदूर।

इस घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया और झारखंड आंदोलन को नई दिशा और तीव्रता प्रदान की। बाद के वर्षों में यही संघर्ष राज्य निर्माण का आधार बना।

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