August 11, 2026
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जमशेदपुर

जमशेदपुर के मंदिरों से फेंके गए फूल को पूर्वी सिंहभूम की महिलाओं ने बनाया आजीविका का आधार

जमशेदपुर के मंदिरों से फेंके गए फूल को पूर्वी सिंहभूम की महिलाओं ने बनाया आजीविका का आधार

अब तक 5.5 टन मंदिरों के फूलों के कचरे का पुनर्चक्रण किया जा चुका

बागुनहातु स्किल सेंटर में एक उत्पादन व प्रशिक्षण केंद्र विकसित किया जा रहा

जमशेदपुर : मंदिरों से फेंके गए फूल को पूर्वी सिंहभूम की महिलाओं ने बनाया आजीविका का आधार। जी हां, पूर्वी सिंहभूम के शहरों और गांवों में हर सुबह सूरज की पहली किरणों के साथ मंदिरों की घंटियां गूंज उठती हैं। श्रद्धालु आस्था, कृतज्ञता और उम्मीद के प्रतीक के रूप में भगवान को फूल अर्पित करते हैं। लेकिन दोपहर होते-होते यही फूल मंदिर परिसर से हटाकर कचरे के ढेर में फेंक दिए जाते हैं।

सालों तक मंदिरों में चढ़ाए गए मुरझाए फूलों को केवल कचरा समझा जाता रहा, जिसे इस्तेमाल के बाद भुला दिया जाता था। लेकिन पूर्वी सिंहभूम की कुछ महिलाओं के लिए यही फूल अब एक नई जिंदगी और आत्मनिर्भरता की नींव बन चुके हैं।

इन्हीं महिलाओं में शामिल हैं खुशबू, जो पहले एक गृहिणी के रूप में घर की जिम्मेदारियों तक सीमित थीं और अक्सर सोचती थीं कि क्या वे कभी अपने परिवार की आर्थिक मदद कर पाएंगी।

खुशबू मुस्कुराते हुए कहती हैं, “पहले कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मंदिरों के फूल हमारी आय का स्रोत बन सकते हैं। आज इस काम के जरिए मैं परिवार के खर्चों में सहयोग कर रही हूं और अपने पैरों पर खड़ी हूं। कमाई से ज्यादा मुझे इससे आत्मविश्वास और खुशी मिलती है। अब हर सुबह यह एहसास होता है कि मेरे पास एक सार्थक काम है, जिसका मैं हिस्सा हूं।”

आज खुशबू स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की सचिव हैं। यह समूह उन कई स्वयं सहायता समूहों में से एक है, जिन्हें टाटा स्टील फाउंडेशन का सहयोग प्राप्त है। वर्तमान में इस पहल से 30 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। ये महिलाएं पूर्वी सिंहभूम के विभिन्न मंदिरों से एकत्र किए गए फूलों को सजावटी फ्लावर धूप कोन में बदलती हैं।

जो फूल कभी कचरा माने जाते थे, उन्हें अब एक नया जीवन मिल रहा है। और ठीक उसी तरह इन महिलाओं को भी।

इस पहल के तहत सोनारी के राम मंदिर और मौनी बाबा मंदिर, साकची के मनोकामना मंदिर, टिनप्लेट काली मंदिर, बेलडीह कालीबाड़ी मंदिर, जादूगोड़ा के रंकिनी मंदिर, पोटका के हरिना मंदिर, गालूडीह के वैष्णो देवी मंदिर समेत कई अन्य मंदिरों से फूल एकत्र किए जाते हैं। इसके बाद फूलों को सावधानीपूर्वक अलग किया जाता है, सुखाया जाता है और प्रसंस्करण के बाद बाजार में बिक्री योग्य उत्पादों में बदला जाता है।

असली बदलाव फूलों में नहीं, बल्कि उन महिलाओं के जीवन में आ रहा है जो इस काम से जुड़ी हैं।

इनमें से अधिकांश महिलाओं के लिए यह उद्यमिता की दुनिया में पहला कदम है। वे उत्पादन प्रबंधन, स्टॉक की निगरानी, गुणवत्ता नियंत्रण और बाजार से जुड़ी गतिविधियों को संभाल रही हैं। जिन कौशलों की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, वे अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं।

इन्हीं महिलाओं में पिंकी भी शामिल हैं, जो कैशियर के रूप में वित्तीय रिकॉर्ड संभालने के साथ-साथ उत्पादन कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं। उनके लिए यह पहल केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और नए अवसरों का माध्यम भी है।

पिंकी कहती हैं, “मुझे गर्व होता है कि मैं अपने परिवार की आर्थिक सहायता कर पा रही हूं और साथ ही पर्यावरण संरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण काम का हिस्सा भी हूं। अन्य महिलाओं के साथ मिलकर काम करने से मुझे खुशी, स्वतंत्रता और बेहतर भविष्य की उम्मीद मिली है। पहले हमारी सुबहें केवल घरेलू कामों तक सीमित रहती थीं, लेकिन अब हम उत्साह और जिम्मेदारी के साथ दिन की शुरुआत करते हैं।”

इस पहल का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अब तक 5.5 टन से अधिक मंदिरों के फूलों के कचरे का पुनर्चक्रण किया जा चुका है, जिससे 61 हजार रुपये से अधिक की बिक्री हुई है। हालांकि, इस प्रयास का वास्तविक मूल्य केवल आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता।

यह महिलाओं के बढ़े हुए आत्मविश्वास में दिखाई देता है। उनके बच्चों के लिए देखे जाने वाले सपनों में सुनाई देता है। और उस सम्मान तथा गरिमा में महसूस किया जा सकता है, जो अपनी मेहनत से आय अर्जित करने और समाज में पहचान बनाने से मिलती है।

यह पहल समाज में भी सकारात्मक बदलाव ला रही है। लोग कचरे के पृथक्करण, पुनः उपयोग और जिम्मेदार उपभोग के प्रति जागरूक हो रहे हैं। जो महिलाएं कभी खुद को केवल देखभाल करने वाली भूमिका तक सीमित मानती थीं, वे आज नेतृत्वकर्ता, उद्यमी और पर्यावरण संरक्षण की अग्रदूत बनकर उभर रही हैं।

इस बढ़ते आंदोलन को और मजबूती देने के लिए बागुनहातु स्किल सेंटर में एक समर्पित उत्पादन एवं प्रशिक्षण केंद्र विकसित किया जा रहा है। यह केंद्र उत्पादन, कौशल विकास, भंडारण प्रबंधन और उत्पाद नवाचार को बढ़ावा देगा, जिससे महिलाएं अपनी उत्पादन क्षमता के साथ-साथ अपने सपनों का भी विस्तार कर सकेंगी।

कल जब फिर मंदिरों में घंटियां बजेंगी और श्रद्धालु नए फूल अर्पित करेंगे, तब पूर्वी सिंहभूम की खुशबू, पिंकी और उनकी साथी महिलाएं उन फूलों को एक नई पहचान देने में जुट जाएंगी।

वे केवल फूलों को नहीं बदल रहीं, बल्कि उनसे संघर्ष, आत्मसम्मान और उम्मीद की नई कहानियां गढ़ रही हैं।

क्योंकि कई बार सबसे खूबसूरत बदलाव उन्हीं चीजों से शुरू होते हैं, जिन्हें दुनिया बेकार समझकर छोड़ चुकी होती है। जो महिलाएं इस योजना से जुड़ी हैं उनकी न केवल दिनचर्या बदली हैं बल्कि आमदनी बढ़ने से उनकी जीवनशैली भी बदल रही है।

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