September 8, 2026
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ऋषिकेश में गंगा तट पर गूँजी भागवत कथा की अमृतधारा,वानप्रस्थ आश्रम में स्वामी गोविन्द देव जी गिरी महाराज का प्रवचन

ऋषिकेश में गंगा तट पर गूँजी भागवत कथा की अमृतधारा,वानप्रस्थ आश्रम में स्वामी गोविन्द देव जी गिरी महाराज का प्रवचन

दान व पांच बुराइयों का त्याग ही जीवन की सच्ची साधना
चंद्र देव सिंह राकेश

ऋषिकेश : गंगा की निर्मल धारा के किनारे स्थित वानप्रस्थ आश्रम में इन दिनों आध्यात्मिक वातावरण अपने चरम पर है। प्रतिदिन हज़ारों श्रद्धालु भागवत कथा के पावन श्रवण हेतु एकत्रित हो रहे हैं, जहाँ स्वामी गोविन्द देव जी गिरी महाराज के मुखारविंद से श्रीमद्भागवत पुराण की व्याख्या हो रही है।

कथा के दौरान रविवार को महाराज ने सुकदेव जी प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने समझाया कि कैसे सुकदेव जी ने केवल भगवान की महिमा का श्रवण करके आत्मकल्याण का मार्ग पाया। प्रवचन के दौरान उन्होंने विशेष रूप से दान के महत्व पर प्रकाश डाला और जीवन को सच्चे अर्थों में सफल बनाने के लिए काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार इन पाँच बुराइयों को त्यागने की प्रेरणा दी।

सुकदेव जी का प्रसंग : त्याग और तपस्या का संदेश
स्वामी गोविन्द देव जी गिरी महाराज ने बताया कि सुकदेव जी ने वैराग्य और तपस्या के मार्ग को अपनाकर संसार को यह सिखाया कि आत्मा अमर है और मानव का परम लक्ष्य भगवत भक्ति है। उन्होंने कहा कि संसार की माया व्यक्ति को बार-बार बंधन में डालती है। जब तक मनुष्य अपने भीतर झाँककर आत्मा के स्वरूप को नहीं पहचानता, तब तक उसे शांति नहीं मिल सकती।”

स्वामी गोविन्द देव जी गिरी महाराज ने कहा कि सुकदेव जी ने अपने जीवन में सांसारिक मोह-माया से दूर रहकर केवल भगवान के नाम का स्मरण किया और यही आचरण आज के युग के लिए भी मार्गदर्शक है।

दान से समाज में संतुलन व सहअस्तित्व
प्रवचन के दौरान स्वामी गोविन्द देव जी गिरी महाराज ने दान के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि धन, वस्त्र, अन्न और ज्ञान का दान समाज में संतुलन स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि दान केवल दया नहीं, बल्कि कर्तव्य है।
उनके शब्दों में—भगवान ने हमें जितना दिया है, उसका एक अंश समाज के लिए समर्पित करना ही जीवन की सच्ची साधना है।

दान से न केवल दूसरे का कल्याण होता है बल्कि दाता का भी हृदय शुद्ध होता है। उसका. धन भी शुद्ध होता है।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि दान निष्काम होना चाहिए। बदले में फल की कामना रखने वाला दान सच्चे अर्थों में दान नहीं, बल्कि लेन-देन है।

पाँच बुराइयों का त्याग ही असली साधना


स्वामी गोविन्द देव जी गिरी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि यदि मनुष्य जीवन की पाँच बुराइयों—काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार—को त्याग दे, तो उसका जीवन स्वतः ही भगवान के चरणों की ओर अग्रसर हो जाता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि—काम व्यक्ति को अंधा बना देता है।क्रोध बुद्धि का नाश करता है।लोभ कभी संतोष नहीं होने देता।मोह इंसान को सत्य से दूर कर देता है और अहंकार अंततः पतन का कारण बनता है।

उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य इन पाँचों को अपने हृदय से बाहर नहीं करता, तब तक सच्ची भक्ति संभव नहीं।

आश्रम में भक्तों की भीड़
वानप्रस्थ आश्रम में आयोजित यह कथा प्रतिदिन दो सत्र में चल रही है। प्रवचन के दौरान भजन-कीर्तन और श्लोक पाठ से वातावरण गूँज उठता है।

हर दिन सैकड़ों श्रद्धालु दूर-दराज़ से यहाँ पहुँचते हैं। कोई गंगा स्नान कर कथा श्रवण करता है, तो कोई संकल्प लेकर दान-पुण्य में सहभागी बनता है। आश्रम परिसर में भक्ति और अध्यात्म का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।

श्रोताओं की प्रतिक्रिया : जीवन बदलने की प्रेरणा
कथा श्रवण करने आए श्रद्धालुओं का कहना है कि स्वामी गोविन्द देव जी गिरी महाराज का प्रवचन केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन जीने की व्यावहारिक राह भी दिखाता है।
रुड़की से आए एक श्रद्धालु ने कहा—आज के समय में जब लोग तनाव और भौतिकता में उलझे हुए हैं, तब महाराज का प्रवचन हमें भीतर झाँकने और सादगी अपनाने की प्रेरणा देता है।

वहीं, हरिद्वार से आई एक महिला श्रद्धालु ने कहा कि दान और सेवा की महत्ता पर दिया गया संदेश उनके लिए जीवन बदलने वाला अनुभव है।

गंगा तट पर आध्यात्मिक वातावरण
गंगा किनारे स्थित वानप्रस्थ आश्रम का वातावरण इन दिनों अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है। गंगा की धारा, भजन की मधुर स्वर लहरियाँ और महाराज के प्रवचनों का संगम श्रद्धालुओं को दिव्य अनुभूति कराता है।

कथा के बाद प्रतिदिन गंगा आरती का आयोजन होता है, जिसमें शामिल होकर श्रद्धालु आत्मिक शांति का अनुभव करते हैं।

आत्मशुद्धि व सेवा ही जीवन का मार्ग
स्वामी गोविन्द देव जी गिरी महाराज के प्रवचनों का सार यही है कि जीवन केवल भोग और भौतिकता के लिए नहीं, बल्कि सेवा, दान और भक्ति के लिए है।
यदि मनुष्य पाँच बुराइयों को त्यागकर दान और सेवा का मार्ग अपनाए तो उसका जीवन न केवल सफल होगा बल्कि समाज भी सद्भाव और संतुलन की ओर बढ़ेगा।

वानप्रस्थ आश्रम में बह रही यह आध्यात्मिक गंगा न केवल ऋषिकेश बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है।

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