September 6, 2026
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जमशेदपुर

झारखंड के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने रचा इतिहास, शेखर गोप ने 20 हजार फीट ऊंची ज़ो-जोंगो चोटी की फतह की

झारखंड के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने रचा इतिहास, शेखर गोप ने 20 हजार फीट ऊंची ज़ो-जोंगो चोटी की फतह की

जमशेदपुर। पश्चिमी सिंहभूम के सुदूर ग्रामीण इलाकों से निकलकर दो दृष्टिबाधित युवाओं ने हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंचकर साहस और आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की है। 24 वर्षीय शेखर गोप ने लद्दाख की समुद्र तल से 20,000 फीट से अधिक ऊंची ज़ो-जोंगो चोटी पर सफलतापूर्वक पहुंचकर तिरंगा फहराया।

वहीं, 23 वर्षीय धीरोज कुमार स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण आगे की चढ़ाई पूरी नहीं कर सके, लेकिन वे 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप तक पहुंचे।

तोड़ानहातु के रहने वाले शेखर और कड़ाजामदा के धीरोज जन्म से ही 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित हैं। सीमित संसाधनों वाले ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े दोनों युवाओं के लिए सामान्य जीवन की बुनियादी गतिविधियां भी कभी चुनौती से कम नहीं थीं।

सफेद छड़ी जैसी जरूरी सुविधाओं तक उनकी पहुंच आसान नहीं थी और कई कामों के लिए उन्हें दूसरों की मदद लेनी पड़ती थी।

2022 में बदली जिंदगी की दिशा

दोनों युवाओं के जीवन में बड़ा बदलाव वर्ष 2022 में आया, जब वे टाटा स्टील फाउंडेशन की दिव्यांगजनों के समावेशन से जुड़ी पहल ‘सबल’ से जुड़े। यहां उन्हें ब्रेल, स्वतंत्र रूप से आने-जाने, रोजमर्रा के कार्य स्वयं करने और डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल का प्रशिक्षण मिला।

धीरे-धीरे प्रशिक्षण ने उनके भीतर आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को मजबूत किया। स्मार्टफोन के जरिए जानकारी हासिल करने और स्वतंत्र रूप से आवागमन करने की क्षमता ने उनके सामने नई संभावनाओं के दरवाजे खोल दिए।

आज शेखर और धीरोज मोबिलिटी ट्रेनर के रूप में काम करते हैं और अन्य दृष्टिबाधित लोगों को स्वतंत्र जीवन के लिए जरूरी कौशल सीखने में मदद करते हैं।

फुटबॉल से पर्वतारोहण तक का सफर

दोनों युवाओं के व्यक्तित्व में बदलाव केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा। तुमुंग में आयोजित आउटडोर प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करने, टीम के साथ काम करने और एक-दूसरे पर भरोसा करने का अनुभव दिया।

इसका असर उनके खेल जीवन पर भी पड़ा। शेखर आगे चलकर झारखंड ब्लाइंड फुटबॉल टीम के कप्तान बने, जबकि धीरोज ने राष्ट्रीय स्तर पर ब्लाइंड फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में राज्य का प्रतिनिधित्व किया।

खेल के मैदान में हासिल किया गया आत्मविश्वास बाद में उनके पर्वतारोहण अभियान में भी काम आया।

दलमा की पहाड़ियों में हुई तैयारी

ज़ो-जोंगो चोटी के अभियान के लिए चयन के बाद दोनों ने कठिन प्रशिक्षण शुरू किया। दलमा हिल्स में आयोजित प्री-एक्सपीडिशन प्रशिक्षण के दौरान उनकी शारीरिक क्षमता, सहनशक्ति और मानसिक मजबूती पर विशेष ध्यान दिया गया।

पर्वतारोहण के लिए जरूरी अनुशासन और कठिन परिस्थितियों में लगातार आगे बढ़ने की क्षमता विकसित करने के लिए उन्हें लगातार चढ़ाई और ट्रेकिंग का अभ्यास कराया गया।

कम ऑक्सीजन और कड़ाके की ठंड के बीच चुनौती

25 अगस्त को शुरू हुआ उनका अभियान लद्दाख की कठिन पर्वतीय परिस्थितियों से गुजरते हुए आगे बढ़ा। ऊंचाई बढ़ने के साथ ऑक्सीजन की कमी, जमा देने वाली ठंड और दुर्गम रास्तों ने अभियान को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया।

इसके बावजूद दोनों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। हालांकि अभियान के दौरान धीरोज की तबीयत बिगड़ने लगी। स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप में रुकना पड़ा।

शेखर ने इसके बाद भी अपनी चढ़ाई जारी रखी और आखिरकार समुद्र तल से 20,000 फीट से अधिक ऊंची ज़ो-जोंगो चोटी पर पहुंचने में सफल रहे।

चोटी से कहीं बड़ी है यह उपलब्धि

शेखर की चोटी फतह और धीरोज का ऊंचाई वाले बेस कैंप तक पहुंचना महज पर्वतारोहण की उपलब्धि नहीं है। यह उस लंबे सफर का परिणाम है, जिसकी शुरुआत उनके गांवों में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश से हुई थी।

ब्रेल सीखने, स्वतंत्र रूप से आवागमन करने और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करने से लेकर मोबिलिटी ट्रेनर बनने, फुटबॉल खेलने और नेतृत्व करने तक दोनों युवाओं ने लगातार अपनी सीमाओं को चुनौती दी।

उनकी कहानी बताती है कि किसी व्यक्ति की क्षमता केवल उसकी परिस्थितियों या शारीरिक सीमाओं से तय नहीं होती। सही अवसर, प्रशिक्षण और आत्मविश्वास मिलने पर कठिन से कठिन लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

‘सबल’ से मिला आत्मनिर्भरता का आधार

टाटा स्टील फाउंडेशन की ‘सबल’ पहल दिव्यांगजनों के अधिकारों, कौशल विकास, आर्थिक सशक्तीकरण और समावेशी सुविधाओं तक पहुंच बढ़ाने पर काम करती है। इसका उद्देश्य दिव्यांगजनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ते हुए उन्हें सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराना है।

शेखर और धीरोज की यात्रा इसी सोच का उदाहरण बनकर सामने आई है। जहां कभी उनके लिए रोजमर्रा की गतिविधियों में दूसरों की मदद जरूरी थी, वहीं आज वे दूसरे दृष्टिबाधित लोगों को आत्मनिर्भर बनने का प्रशिक्षण दे रहे हैं और कठिन पर्वतीय अभियानों का हिस्सा बन रहे हैं।

पश्चिमी सिंहभूम से हिमालय तक प्रेरणा की कहानी

25 अगस्त से 31 अगस्त 2026 तक चले इस सफर ने दोनों युवाओं के लिए नई पहचान कायम की। शेखर ने 20,000 फीट से अधिक ऊंची ज़ो-जोंगो चोटी पर तिरंगा फहराया, जबकि धीरोज स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के बावजूद 16,732 फीट की ऊंचाई तक पहुंचे।

पश्चिमी सिंहभूम के सुदूर गांवों से शुरू हुआ यह सफर साबित करता है कि बड़ी मंजिल तक पहुंचने के लिए पहला कदम आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाना जरूरी है। शेखर और धीरोज ने अपनी उपलब्धि से न केवल पर्वतारोहण की एक नई कहानी लिखी, बल्कि यह संदेश भी दिया कि अवसर और दृढ़ संकल्प मिल जाएं तो चुनौतियां मंजिल का रास्ता रोक नहीं सकतीं।

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