==मजदूरों के हितों से खिलवाड़ पर उठे तीखे सवाल
==वेज रिविजन के नाम पर सिर्फ राजनीति तेज,अंदरूनी कलह और गुटबाजी ने खोली पोल
==समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले नेता अब एक-दूसरे पर मढ़ रहे ठीकरा
जमशेदपुर: देश में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी यूनियनों में से एक और टाटा स्टील का मान्यता प्राप्त मजदूर संगठन टाटा वर्कर्स यूनियन (TWU) की सोमवार को हुई कमेटी मीटिंग हंगामे और जबरदस्त तनाव का अखाड़ा बन गई।
चार महीने के एकाउंट्स पास कराने के एजेंडे के साथ बुलाई गई इस बैठक में माहौल तब पूरी तरह गरमा गया जब कमेटी मेंबरों ने सत्तारूढ़ खेमे से वेजरिविजन (Wage Revision) में आई गंभीर विसंगतियों पर सीधा स्पष्टीकरण और जवाब मांग लिया।
मीटिंग के दौरान सत्ता पक्ष इन तीखे सवालों से पूरी तरह भागता हुआ नजर आया, जिससे यूनियन के भीतर लंबे समय से सुलग रहा असंतोष खुलकर सामने आ गया।
गुटबाजी और सत्ता की खींचतान चरम पर
आगामी जनवरी माह में होने वाले यूनियन चुनाव को ध्यान में रखते हुए सत्तारूढ़ खेमे के नेता अभी से अपनी-अपनी राजनीतिक पोजीशनिंग मजबूत करने में जुटे हैं।
बैठक के दौरान यह भी देखने को मिला कि सत्ता पक्ष के खिलाफ मुखर तेवर दिखाने वाले कुछ लोगों को खुद सत्ता खेमे के ही एक वरिष्ठ नेता का परोक्ष (छिपा हुआ) समर्थन प्राप्त था, जो यूनियन के भीतर चल रही भीषण अंदरूनी गुटबाजी और फूट को साफ उजागर करता है।
बड़ा सवाल: सवा साल की देरी के बाद भी विसंगतियां क्यों?
मजदूरों के बीच अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि जब वेजरिविजन समझौता सवा साल के लंबे विलंब (डिले) के बाद हुआ था, तो इतने लंबे समय तक ये तथाकथित नेता आखिर क्या वर्कआउट कर रहे थे?
जो नेता गर्व से समझौते के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर रहे थे, आज जब मजदूरों के सामने विकट समस्याएं आ रही हैं, तो वे अपनी नाकामी स्वीकार करने के बजाय सारा दोष दूसरों के सिर पर मढ़ने में लगे हैं।
वेतनमान और एमजीवी (MGB) में भारी विसंगतियां:
कम लाभ: स्टील वेज कर्मचारियों को 10% एमजीवी का लाभ देने की बात कही गई, लेकिन हकीकत में इसे जनवरी 2025 के वेतन पर मात्र 5% एमजीवी दिया गया और वही राशि फिर अप्रैल 2026 में दी गई।
एनएस ग्रेड (NS Grade): एनएस ग्रेड के मामले में एमजीवी को एकमुश्त राशि (Amount) में दिया गया है।
इंक्रीमेंट की तिथि का विवाद: कर्मचारियों के वेतनमान में सबसे गंभीर विसंगति इंक्रीमेंट की तारीख को लेकर पैदा हुई है, जिससे श्रमिक वर्ग खासा परेशान और आक्रोशित है।
यूनियन को मिलने वाले चंदे से भी कम मिला लाभ
एक कमेटी मेंबर ने बेहद आक्रामक अंदाज में अपनी भड़ास निकालते हुए यहां तक कह डाला कि मजदूर साल भर में जितना चंदा यूनियन को देते हैं, उतनी राशि तो उन्हें एमजीवी में भी नहीं मिल पाई है।
वर्तमान हालात यह हैं कि टाटा वर्कर्स यूनियन में फिलहाल विपक्ष नाम की कोई औपचारिक ताकत नहीं बची है, बल्कि अब सत्तारूढ़ दल के लोग ही आपस में भिड़कर अपनी-अपनी आगे की रणनीति तैयार कर रहे हैं और वेजरिविजन के बहाने एक-दूसरे को पटखनी देने की जुगत में पूरी तरह जुटे हुए हैं।