जमशेदपुर : शहर में रहने वाले मलयाली परिवारों ने रविवार को पारंपरिक उल्लास और श्रद्धा के साथ ओणम पर्व मनाया। केरल की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रखते हुए विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक रस्मों का आयोजन किया गया।
इस दौरान लोगों ने एक-दूसरे को ओणम की शुभकामनाएं दीं और सुख-समृद्धि की कामना की।
केरल समाजम, जमशेदपुर की ओर से भी ओणम के अवसर पर शहरवासियों को शुभकामनाएं दी गईं। संस्था ने लोगों के जीवन में सुख, समृद्धि, बेहतर स्वास्थ्य और पारिवारिक एकता की कामना की।
समाजम ने ओणम को केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, सौहार्द, विनम्रता और सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला त्योहार बताया।
ओणम उत्सव में शामिल हुए बड़ी संख्या में लोग
केरल समाजम की ओर से आयोजित ओणम कार्यक्रम के बाद पारंपरिक ओणसद्या का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। पारंपरिक तरीके से परोसे गए विभिन्न व्यंजनों का लोगों ने आनंद लिया और उत्सव के माहौल में एक-दूसरे के साथ खुशियां साझा कीं।
उत्सव के दौरान पूकलम मत्सरम (फूलों की सजावट प्रतियोगिता) भी आयोजित की गई। प्रतिभागियों ने रंग-बिरंगे फूलों से आकर्षक पूकलम तैयार कर अपनी रचनात्मकता और कला का प्रदर्शन किया। फूलों से सजे पूकलम ने पूरे आयोजन को खास आकर्षण दिया।
समाजम के पदाधिकारियों ने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने के साथ समाज में भाईचारे, एकता और सामाजिक समरसता को मजबूत करते हैं।
महाबली के स्वागत की परंपरा से जुड़ा है ओणम
ओणम मुख्य रूप से केरल का प्रमुख पारंपरिक पर्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने और उन्हें आशीर्वाद देने के लिए पाताल लोक से धरती पर आते हैं। उनके स्वागत में घरों की साफ-सफाई की जाती है और फूलों से सजावट की जाती है।
ओणम से भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा महाबली से तीन पग भूमि मांगी थी। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण ओणम का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व काफी अधिक माना जाता है।
थिरुवोणम नक्षत्र से जुड़ा है पर्व
ओणम का मुख्य आयोजन थिरुवोणम नक्षत्र के दौरान होता है। मलयालम कैलेंडर के चिंगम महीने में आने वाले थिरुवोणम को ओणम का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। पर्व के दौरान घरों के आंगन में फूलों से पूकलम बनाया जाता है और भगवान विष्णु तथा राजा महाबली की पूजा-अर्चना की जाती है।
ओणम को नई फसल और अच्छी उपज से भी जोड़कर देखा जाता है। इसलिए यह पर्व किसानों और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा से भी जुड़ा हुआ है।
ओणसद्या और वल्लमकली हैं प्रमुख आकर्षण
ओणम के दौरान पारंपरिक ओणसद्या का विशेष महत्व है। केले के पत्ते पर कई तरह के पारंपरिक व्यंजन परोसकर सामूहिक रूप से भोजन करने की परंपरा है। इसके अलावा केरल में वल्लमकली यानी पारंपरिक नौका दौड़, पुलिकली यानी बाघ नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी ओणम उत्सव का प्रमुख हिस्सा हैं।
ओणम के दिनों में घरों को फूलों और रंगोली से सजाया जाता है। महिलाएं और परिवार के अन्य सदस्य मिलकर पारंपरिक व्यंजन तैयार करते हैं। कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य और प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं।
चार दिवसीय अवकाश की भी है परंपरा
केरल में थिरुवोणम के आसपास ओणम का विशेष उत्सव मनाया जाता है। पर्व के प्रमुख दिनों को प्रथम ओणम, द्वितीय ओणम, तृतीय ओणम और चतुर्थ ओणम के रूप में जाना जाता है। इनमें द्वितीय ओणम को थिरुवोणम कहा जाता है, जिसे पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
जमशेदपुर में भी मलयाली समाज अपनी परंपराओं को कायम रखते हुए हर वर्ष ओणम का आयोजन करता है। इस वर्ष भी पूजा, पूकलम, ओणसद्या और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए लोगों ने पर्व की खुशियां साझा कीं।