मुख्य बिंदु
- लंबी प्रतीक्षा के बाद सिर्फ एक पद: राज्यसभा सांसद प्रदीप वर्मा बने राष्ट्रीय सचिव, वरिष्ठ दिग्गजों और पूर्व मुख्यमंत्रियों की पूर्ण उपेक्षा।
- ’रांची केंद्रित’ राजनीति पर मुखर हुए कार्यकर्ता, सवाल उठ रहा है कि क्या राजधानी से बाहर के नेता सिर्फ ‘दरी बिछाने’ के लिए हैं?
राकेश कुमार
जमशेदपुर: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन द्वारा घोषित नई राष्ट्रीय टीम ने झारखंड के राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।
इस टीम में झारखंड से जुड़े नेताओं को जिस न्यूनतम प्रतिनिधित्व (सिर्फ एक पद) से संतोष करना पड़ा है, उसने राज्य के भाजपा कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच गहरी निराशा और सुलगते असंतोष को जन्म दे दिया है।
दिग्गजों की फौज और हाशिए का यथार्थ
झारखंड में भाजपा की सांगठनिक ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में पार्टी के पास पाँच पूर्व मुख्यमंत्री, कई पूर्व केंद्रीय मंत्री और दर्जनों पूर्व प्रदेश अध्यक्षों का लंबा चौड़ा अनुभव मौजूद है। इसके बावजूद, केंद्रीय टीम के गठन में इनमें से किसी भी बड़े और स्थापित चेहरे को स्थान नहीं मिला है।
पार्टी ने राज्यसभा सांसद प्रदीप वर्मा को राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी सौंपी है।
प्रदीप वर्मा वर्तमान में प्रदेश भाजपा में उपाध्यक्ष पद पर थे और इससे पहले प्रदेश महामंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।
सांगठनिक अनुभव के लिहाज से वे एक सुलझे हुए नेता हैं, लेकिन राज्य के राजनीतिक कद और वरिष्ठता क्रम को देखें, तो यह प्रतिनिधित्व बहुत सीमित माना जा रहा है।
रांची केंद्रित" राजनीति का पुराना साया
इस नई घोषणा के बाद से राज्य में एक" पुरानी और संवेदनशील चर्चा फिर से जोर पकड़ने लगी है—वह है ‘रांची सेंट्रिक’ (रांची केंद्रित) राजनीति।
कार्यकर्ताओं और अंदरखाने चल रही चर्चाओं के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के भीतर जितने भी बड़े और केंद्रीय पद मिले हैं, उन सभी का सीधा जुड़ाव राजधानी रांची से ही रहा है।
यदि पिछले कुछ बड़े नामों पर नजर डालें, तो दीपक प्रकाश, आदित्य साहू, आशा लकड़ा व प्रदीप वर्मा जैसे प्रमुख चेहरों का केंद्रबिंदु रांची ही रहा है।
इसके अलावा, वर्तमान राजनीतिक समीकरणों में बाबूलाल मरांडी को छोड़कर राज्य के बाकी सभी पूर्व मुख्यमंत्री लगभग हाशिए पर चले गए हैं।
कार्यकर्ताओं का तीखा सवाल: "क्या बाकी जिलों के नेता सिर्फ दरी बिछाने के लिए हैं?"
इस एकतरफा प्रतिनिधित्व ने पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को मुखर होने पर मजबूर कर दिया है।
सुदूर ग्रामीण और आदिवासी अंचलों के कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल आम हो गया है कि आखिर रांची की माटी में ऐसी कौन सी जादुई खूबी है, जो राज्य के अन्य हिस्सों के भाजपाइयों की धरती में नहीं पाई जाती?
पार्टी के भीतर अब यह दबी जुबान से नहीं, बल्कि खुले तौर पर चर्चा होने लगी है कि क्या राजधानी रांची को छोड़कर झारखंड के बाकी जिलों के समर्पित भाजपाई केवल धरना-प्रदर्शन करने और रैलियों में दरी बिछाने तक के ही काम के लिए रह गए हैं?
पार्टी आलाकमान के लिए चुनौती
झारखंड में आगामी राजनीतिक और चुनावी चुनौतियों को देखते हुए यह असंतोष भाजपा के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है।
यदि समय रहते क्षेत्रीय संतुलन और सांगठनिक न्याय को साधने का प्रयास नहीं किया गया, तो यह अंतर्कलह पार्टी के जमीनी मनोबल को कमजोर कर सकती है।
कार्यकर्ताओं की यह नाराजगी अब केवल एक चर्चा नहीं, बल्कि केंद्रीय नेतृत्व के सामने एक बड़ा वैचारिक और सांगठनिक सवाल बनकर खड़ी हो गई है।
