राजस्व और कल्याणकारी योजनाओं के मुद्दे पर केंद्र से टकराव तेज
झारखंड की राजनीति में खनन विधेयक ने नया मोड़ ला दिया है। संसद ने खनन कानून में संशोधन मंजूर किया है। अब यह विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी की प्रतीक्षा में है।
हालांकि, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से पुनर्विचार की अपील की। सोरेन ने राज्य के राजस्व पर असर की आशंका जताई है।
दरअसल, खनिज संपदा झारखंड की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। राज्य ने खनिजयुक्त भूमि उपकर से बड़ी आय का अनुमान लगाया है। वर्ष 2026-27 में यह अनुमान 14,656 करोड़ रुपये है।
हालांकि, विधेयक के वास्तविक वित्तीय प्रभाव पर बहस जारी है। केंद्र और राज्य की दलीलें फिलहाल अलग-अलग हैं। इसलिए योजनाओं के बंद होने का दावा सावधानी से देखना होगा।
दूसरी ओर, हेमंत सोरेन के लिए यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। सरकार पहले ही छात्र आंदोलनों के दबाव में रही है। वहीं, भाजपा लगातार सरकार पर हमलावर रही है। जेपीएससी विवाद ने भी राजनीतिक तनाव बढ़ाया है।
इसके अलावा, विपक्ष राज्य सरकार पर वित्तीय सवाल उठा रहा है। दूसरी ओर, सरकार केंद्र से बकाया राशि की मांग करती रही है। जून में सोरेन ने कोयला कंपनियों के बकाये का मुद्दा उठाया था।
इसी बीच, खनन विधेयक ने सरकार को नया राजनीतिक मंच दिया है। अब लड़ाई केवल खनन नीति तक सीमित नहीं रहेगी। इसके साथ संघीय अधिकार और राज्य का राजस्व भी जुड़ गया है।
हालांकि, इस मुद्दे को जनआंदोलन में बदलना आसान नहीं होगा। सरकार को अपने दावों के ठोस आंकड़े देने होंगे। वहीं, केंद्र को भी राज्यों की वित्तीय चिंताओं का जवाब देना होगा।
राजनीतिक दृष्टि से यह मुद्दा हेमंत सरकार के लिए महत्वपूर्ण है। इसके जरिए वह विपक्ष के हमलों का जवाब दे सकती है। लेकिन अंतिम असर जनता के बीच इसकी स्वीकार्यता पर निर्भर करेगा।
