August 28, 2026
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असद अली खान: कहानी रुद्र वीणा के उस साधक की, जिनके बाद खाली पड़ गई एक परंपरा

असद अली खान: कहानी रुद्र वीणा के उस साधक की, जिनके बाद खाली पड़ गई एक परंपरा

नई दिल्ली, 13 जून (आईएएनएस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा में रुद्र वीणा सिर्फ एक वाद्ययंत्र नहीं बल्कि सदियों पुरानी सांगीतिक विरासत का जीवंत प्रतीक रही है। हालांकि अब यह रुद्र वीणा विलुप्ति के कगार पर है। बदलते समय, घटती साधना और कम होते साधकों के बीच रुद्र वीणा की गूंज अब विरल होती जा रही है। जब भी इस दुर्लभ वाद्य की चर्चा होगी, एक नाम बड़े सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाएगा और यह नाम है उस्ताद असद अली खान का। उस्ताद असद अली खान रुद्र वीणा के आखिरी महान उस्तादों में से एक थे, जिन्होंने जटिल खंडारबानी परंपरा को आगे बढ़ाया।

1 दिसंबर 1937 को राजस्थान के अलवर में ‘बीनकार’ परिवार की सातवीं पीढ़ी में जन्मे असद अली खान को छह साल की उम्र से ही उनके पिता उस्ताद सादिक अली खान ने कड़ी ट्रेनिंग दी थी। बेजोड़ तकनीकी सटीकता और ध्यानमग्न करने वाली गहराई के साथ मशहूर हुए असद अली खान प्राचीन रुद्र वीणा परंपरा के आखिरी सच्चे कलाकार के तौर पर जाने गए।

उनकी वीणा की मधुर ध्वनि और उनका आजीवन समर्पण और आत्म अनुशासन उनके जीवनकाल में ही बीते हुए समय की एक स्मृति की तरह प्रतीत होता था। उन्होंने अपने दौर में न सिर्फ रुद्र वीणा की प्राचीन परंपरा को जीवित रखा बल्कि अपने अद्वितीय वादन और समर्पण से इसे नई पीढ़ियों तक पहुंचाने का अथक प्रयास भी किया।

1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित असद खान के करियर में कई राष्ट्रीय प्रसारण, कॉन्सर्ट और अंतरराष्ट्रीय दौरे शामिल रहे। उन्होंने यूरोप, अमेरिका, अफगानिस्तान और अन्य जगहों पर दर्शकों के सामने वीणा की अनोखी आवाज पेश की। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी व ऑल इंडिया रेडियो और बाद में भारतीय कला केंद्र में फैकल्टी के तौर पर काम किया। साथ ही निजी तौर पर इस वाद्य को सिखाने में भी अहम भूमिका निभाई।

असद अली खान इस बात से भलीभांति परिचित थे कि आधुनिक भारत के आर्थिक विकास, सीमित वित्तीय संसाधनों और अनिश्चित करियर संभावनाओं को देखते हुए एक पुराने वाद्य यंत्र का दशकों तक अध्ययन युवा भारतीय संगीतकारों के लिए आशाजनक भविष्य प्रदान नहीं कर सकता। 1960 से 1980 के दशक तक उन्होंने भारतीय कला केंद्र, नई दिल्ली और दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया लेकिन वीणा के छात्रों की कमी के कारण वे संगीत सिद्धांत और वीणा शैली में सितार वादन की कक्षाएं देते थे।

सोलो परफॉर्मेंस और लेक्चर-डेमोंस्ट्रेशन में हिस्सा लेते हुए वे अपने अद्भुत आलाप, जोड़ और झाला के लिए जाने गए। उस्ताद असद अली खान के जीवनभर के कार्यों को देखते हुए 2008 में भारत सरकार की ओर से पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

14 जून 2011 को उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत ने अपने एक महान व्यक्तित्व और पारंपरिक रुद्र वीणा के सबसे महान समकालीन उस्ताद उस्ताद असद अली खान को खो दिया।

डीसीएचपीएम

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