भाजपा नेता चंदन सिंह ने सोशल मीडिया पर बयां की अपनी व्यथा
निष्ठा की यही कीमत है? चंदन सिंह को अपनों की खामोशी का मलाल
बोले- ‘जिसे परिवार समझा, उसकी खामोशी चुभ रही है
मृत्युंजय सिंह गौतम
जमशेदपुर: राजनीति में अक्सर ‘संगठन को परिवार’ कहा जाता है, लेकिन जब वही परिवार अपनों के सबसे कठिन दौर में खामोश हो जाए, तो दर्द गहरा होता है। जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित डी डी बार में हुए खूनी संघर्ष के बाद आदित्यपुर के हिमांशु सिंह और प्रत्यूष आनंद (प्रत्यूष सिंह) पर हुए नृशंस हमले ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है।
दुर्भाग्यवश, इस हमले में हिमांशु सिंह ने दम तोड़ दिया, वहीं प्रत्यूष आनंद कोलकाता के अपोलो अस्पताल में मौत को मात देने की जद्दोजहद कर रहे हैं।
इस पूरी त्रासदी के बीच, प्रत्यूष के पिता और आदित्यपुर के सक्रिय सामाजिक-राजनीतिक व्यक्तित्व चंदन सिंह ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट साझा की है, जो न केवल उनके निजी दुख को बयां करती है, बल्कि राजनीतिक नैतिकता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
क्या कार्यकर्ता सिर्फ उपयोग की वस्तु है?
चंदन सिंह ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए लिखा है कि जिस भाजपा को उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित किया, जिस संगठन के लिए उन्होंने तन-मन-धन से काम किया, आज उसी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की खामोशी उनके जख्मों को और गहरा कर रही है।
उनका सवाल सीधा और चुभने वाला है—“क्या वर्षों की निष्ठा, समर्पण और संघर्ष की यही कीमत होती है?”
उनका यह दर्द एक ऐसे पिता का है, जो अपने बेटे को अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी की जंग लड़ते देख रहा है और उम्मीद कर रहा था कि जिस ‘परिवार’ के लिए उसने सालों तक काम किया, वह कम-से-कम एक फोन कॉल या सांत्वना के दो शब्दों से उनका हौसला बढ़ाएगा।
पुलिस सुरक्षा पर भी उठे सवाल
यह घटना सिर्फ एक आपसी विवाद नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था पर भी एक बड़ा सवालिया निशान है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घटना के बाद पुलिस वैन में शरण लेने के बावजूद हमलावरों ने हिमांशु और प्रत्यूष पर चपड़ से हमला किया।
यह स्थिति दर्शाती है कि शहर में अपराधी कितने बेखौफ हो चुके हैं।
एक पिता की आखिरी प्राथमिकता
चंदन सिंह ने स्पष्ट किया है कि यह पोस्ट किसी राजनीतिक लाभ या विवाद के लिए नहीं है, बल्कि यह एक टूटे हुए पिता की अंतरात्मा की आवाज है।
उनकी पहली और आखिरी प्राथमिकता फिलहाल अपने बेटे प्रत्यूष का जीवन बचाना है। उनके अनुसार, संकट की घड़ी में ही अपनों की असली पहचान होती है और आज उन्होंने इस कड़वे सच को बहुत करीब से अनुभव किया है।
इस घटना ने जमशेदपुर के राजनीतिक गलियारों में एक बहस छेड़ दी है कि क्या कार्यकर्ता का मूल्य केवल चुनाव तक सीमित है, या फिर उसे संकट के समय में भी संगठन का संबल मिलना चाहिए। फिलहाल, पूरा शहर प्रत्यूष के जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहा है।
(चंदन सिंह के सोशल मीडिया पर किए गए पोस्ट के आधार पर यह खबर तैयार की गई है )
