September 9, 2026
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जमशेदपुर

Sidhgora Surya Mandir Ram Katha Day 4: कथा व्यास पंडित गौरांगी गौरी ने भगवान राम की बाल लीला का प्रसंग सुनाया

Sidhgora Surya Mandir Ram Katha Day 4: कथा व्यास पंडित गौरांगी गौरी ने भगवान राम की बाल लीला का प्रसंग सुनाया
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जमशेदपुर: सिदगोड़ा सूर्यमंदिर परिसर में संगीतमय श्रीराम कथा के चतुर्थ दिन कथा व्यास पंडित गौरांगी गौरी ने भगवान राम के बाल लीला का प्रसंग सुनाया. उन्होंने कहा कि आज के युवा चाहे जितने भी मॉडर्न बन जाए लेकिन अपनी सनातन संस्कृति एवं परंपरा को न भूलें.

सिदगोड़ा सूर्य मंदिर कमिटी द्वारा श्रीराम मंदिर स्थापना के तृतीय वर्षगांठ के अवसर पर सात दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा के चतुर्थ दिन कथा प्रारंभ से पहले वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सूर्य मंदिर समिति के मुख्य संरक्षक सह पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, संरक्षक चंद्रगुप्त सिंह, भाजपा झारखंड प्रदेश के प्रांतीय संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह, आरएसएस के विभाग प्रचारक सत्यप्रकाश जी, हटिया के विधायक नवीन जायसवाल, पूर्व मंत्री सह विधायक अमर बाउरी, भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता कुणाल षाड़ंगी, धनबाद के निवर्तमान मेयर शेखर अग्रवाल एवं अन्य ने व्यास पीठ एवं व्यास का विधिवत पूजन किया गया.

पूजन पश्चात श्री अयोध्याधाम से पधारे मर्मज्ञ कथा वाचिका पूज्य पंडित गौरांगी गौरी जी का स्वागत किया गया. स्वागत के पश्चात कथा व्यास पंडित गौरांगी गौरी ने श्रीराम कथा के चतुर्थ दिन भगवान राम के बाल लीला का कथा प्रसंग सुनाया.

कथा वाचिका पंडित गौरी गौरांगी.

व्यास पूज्य पंडित गौरांगी गौरी जी ने भगवान राम की सुंदर बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए बताया कि बचपन से ही लक्ष्मण जी की राम जी के चरणों में प्रीति थी. और भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों में स्वामी और सेवक की जिस प्रीति की प्रशंसा है, वैसी प्रीति हो गई. वैसे तो चारों ही पुत्र शील, रूप और गुण के धाम हैं लेकिन सुख के समुद्र श्री रामचन्द्रजी सबसे अधिक हैं. माँ कौशल्या कभी गोदी में लेकर भगवान को प्यार करती है. कभी सुंदर पालने में लिटाकर ‘प्यारे ललना!’ कहकर दुलार करती है, जो भगवान सर्वव्यापक, निरंजन (मायारहित), निर्गुण, विनोदरहित और अजन्मे ब्रह्म हैं, वो आज प्रेम और भक्ति के वश कौसल्याजी की गोद में खेल रहे हैं.

सुमधुर संगीत के बीच पुज्य गौरांगी गौरी जी ने बताया कि एक बार माता कौशल्या ने श्रीराम को स्नान और श्रृंगार करा कर झूला पर सुला दिया और स्वयं स्नान कर अपने कुलदेव की पूजा कर नैवेद्य भोग लगाकर पाक गृह गई. जब वह पुन: लौट कर पूजा स्थल पर आई तो उन्होंने देखा कि देवता को चढ़ाए गए नैवेद्य शिशुरूपी भगवान राम भोजन कर रहे हैं.

जब उन्होंने झूला पर जाकर देखा तो वहां भी उन्होंने श्री राम को झूले पर सोते पाया. इस दृश्य को देखकर कौशल्या डर गई और कांपने लगी. माता की अवस्था देख श्री राम ने माता को अपना विराट रूप दिखाकर उनकी जिज्ञासा को शांत किया. भगवान का विराट रूप देखकर कौशल्या माता प्रफुल्लित हो उन के चरणों पर गिर पड़ी. बालरूप भगवान की भक्ति में देवता भी मगन थे. जिनका नाम सुनना ही शुभ है उनका साक्षात दर्शन का फल कौन प्राप्त करना नही चाहेगा?

कथाव्यास पंडित गौरांगी गौरी ने कहा कि जिस भगवान की गोद में ब्रह्माण्ड खेलता है, वह भगवान बालरूप में माता कौशल्या की गोद में खेलते हैं. जिनकी गोंद में दुनियाँ हँसती रोती है वे माता कौशल्या की गोद में कभी रोते हैं तो कभी हंसते है. भगवान की बाललीला अदभुत और मनमोहक है.

कथा में आगे वर्णन करते हुए पंडित गौरांगी गौरी जी कहते है कि आज भारत का बचपन नष्ट हो रहा है. बचपन नष्ट करने वाले कोई और नहीं, बल्कि उनके परिवार ही हैं. यदि बचा सके तो आज बचपन बचाएँ. बच्चे अपने परिवार की पाठशाला में ही सर्वप्रथम सीखतें हैं. हमारा पारिवारिक जीवन जैसा होगा, भावी पीढ़ी भी वैसी ही होगी. परिवार में जैसे संस्कार होगें, वैसा ही संस्कार बालक सीखता है. कथाव्यास कहते है कि यदि वृक्ष को हरा-भरा देखना है तो उसके मूल में पानी डालों, पत्ते सींचने से क्या होगा. अतः यदि देश में संस्कारवान पीढ़ी खड़ा करनी हो तो बच्चों के बचपन को संस्कारवान बनाया जाय.

सूर्य मंदिर में श्रीराम कथा का आनंद लेते श्रोता.

आगे, कथा में महाराजा दशरथ के चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार सम्पूर्ण हुआ. महर्षि वशिष्टि द्वारा चारों पुत्रों का नामकरण और उनकी महिमा का उल्लेख कथा का केन्द्र बिन्दु बना और इसी के साथ कथा व्यास पंडित गौरांगी गौरी ने कथा को विस्तार देते हुए कथा को विश्वामित्र द्वारा भगवान राम के मांगे जाने की ओर वर्णन किया.

अयोध्या नरेश दशरथ के दरबार में विश्वामित्र राक्षसों के वध के लिए राम को मांगते है. महाराजा दशरथ विश्वामित्र के आने का कारण पूछते हुए कहते है- केहि कारण आगमन तुम्हारा, विश्वामित्र ने महाराजा दशरथ से कहा – अनुज समेत देहु रघुनाथा, निशिचर बधै मैं हो हुं सनाथा. महाराजा दशरथ ने तो यह माना था कि विश्वामित्र धन सम्पदा मांगने आये हैं परंतु उन्हें कहां पता था की एक ऋषि राष्ट्र की रक्षा के लिए उनके प्राणों के प्रिय राजकुमारों को मांगने आये हैं. उन्होंने कहा कि वास्तव में संत धरती पर धर्म की रक्षा के लिए आते हैं, राष्ट्र की रक्षा के लिए आते हैं.

संत परमात्मा की करूणा के अवतार हैं. संत चलते-फिरते साक्षात तीर्थ हैं. गुरु वशिष्ट के समझाने पर वे राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजते है. इस बहाने विश्वामित्र द्वारा अपनी तपस्या में प्राप्त सभी दिव्यास्त्रों को रामलक्ष्मण को सुपुर्द करते है. ताड़का का बध, मारिच से यज्ञ की रक्षा और अहिल्या का उद्धार पर कथा आगे बढ़ती है.

इस दौरान 5 सदस्यीय गायक मंडली भजन आदि सुना कर श्रद्धालुओं का मन मोह रहे थे. कथा में मंच संचालन राकेश सिंह ने किया.

कल राम कथा के पंचम दिवस में प्रभु श्रीराम विवाह के प्रसंग का वर्णन किया जाएगा. कथा दोपहर 3:30 बजे से प्रारंभ होती है.

कथा के दौरान प्रभात खबर के संपादक संजय मिश्र, उप संपादक संजीव भारद्वाज, चमकता आईना के संपादक ब्रजभूषण सिंह, अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह, उधमी संजय पलसानिया, बिमल बैठा, अजय सिंह, हेमंत सिंह, अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह, संजीव सिंह, अमरजीत सिंह राजा, संतोष यादव, शशिकांत सिंह, महामंत्री अखिलेश चौधरी, रूबी झा, कृष्ण मोहन सिंह, बंटी अग्रवाल, कंचन दत्ता, लक्ष्मीकांत सिंह, प्रेम झा, प्रमोद मिश्रा एवं तृतीय वर्षगांठ आयोजन समिति के संयोजक गुंजन यादव, दिनेश कुमार, राकेश सिंह, कुलवंत सिंह बंटी, टुनटुन सिंह, कमलेश साहू, महेंद्र यादव, कल्याणी शरण, खेमलाल चौधरी, बबुआ सिंह, बोलटू सरकार, धर्मेंद्र प्रसाद, सुरेश शर्मा, संतोष ठाकुर, दीपक झा, संदीप शर्मा बॉबी, श्रीराम प्रसाद, कुमार अभिषेक, अशोक सामंत, नरेंद्र ओझा, विकास शर्मा, ओम प्रकाश रजक, राकेश गिरी, संतोष कुमार, शैलेन्द्र प्रसाद, देबाशीष झा, राकेश राय, अनुराग मिश्रा, पुष्पेंद्र मिश्रा, सुधा यादव, बिमला साहू समेत अन्य लोग उपस्थित थे.

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