गिरिडीह। पारसनाथ पहाड़ को लेकर धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक अधिकारों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। विश्व जैन संगठन के अध्यक्ष संजय जैन की ओर से पारसनाथ पहाड़ को लेकर किए गए दावों और केंद्र व राज्य सरकार से जैन समुदाय के लिए विशेष व्यवस्था की मांग का मारंग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा ने विरोध किया है।
मोर्चा का कहना है कि पारसनाथ पहाड़ संथाल आदिवासी समाज के लिए सदियों से मारंग बुरू के रूप में आस्था और धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख केंद्र रहा है।
मोर्चा ने अपने बयान में कहा कि संथाल आदिवासी समुदाय लंबे समय से पारसनाथ पहाड़ और आसपास के इलाकों में अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों और प्रथागत व्यवस्था के तहत पूजा-अर्चना करता आ रहा है।
संगठन ने पूरे मारंग बुरू क्षेत्र को संथाल समाज का पवित्र धार्मिक स्थल बताते हुए कहा कि यहां की परंपराएं और सामाजिक व्यवस्था आदिवासी समुदाय की ऐतिहासिक पहचान से जुड़ी हैं।
24 से अधिक टोलों में कायम है पारंपरिक व्यवस्था
मारंग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा के अनुसार, मारंग बुरू-पारसनाथ क्षेत्र में 24 से अधिक टोले हैं, जहां आज भी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में माझी यानी प्रधान की महत्वपूर्ण भूमिका है।
संगठन का दावा है कि इन क्षेत्रों में सामाजिक और धार्मिक गतिविधियां लंबे समय से आदिवासी समाज की प्रथागत व्यवस्था के अनुसार संचालित होती रही हैं।
मोर्चा ने कहा कि संथाल आदिवासी समुदाय के पारंपरिक और प्रथागत अधिकारों को न्यायालय स्तर पर भी मान्यता मिली है। ऐसे में किसी एक समुदाय की धार्मिक मांग के आधार पर पारसनाथ पहाड़ के संबंध में एकतरफा व्यवस्था लागू करने की मांग उचित नहीं होगी।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 का दिया हवाला
संगठन ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 का हवाला देते हुए सभी समुदायों के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के समान संरक्षण की मांग की।
मोर्चा का कहना है कि यदि किसी एक समुदाय के पक्ष में विशेष व्यवस्था की जाती है और आदिवासी समाज के पारंपरिक अधिकारों की अनदेखी होती है, तो यह संवैधानिक भावना के विपरीत होगा।
मोर्चा ने केंद्र और झारखंड सरकार से आग्रह किया कि पारसनाथ पहाड़ से जुड़े किसी भी निर्णय से पहले स्थानीय आदिवासी समाज, पारंपरिक नेतृत्व और अन्य संबंधित पक्षों से संवाद किया जाए।
‘सम्मेद शेखर’ नाम को लेकर भी उठाए सवाल
मारंग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा ने पारसनाथ पहाड़ के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ‘सम्मेद शेखर’ नाम पर भी सवाल उठाया है। संगठन का दावा है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस नाम का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, जबकि ‘मारांङ बुरू’ नाम के उल्लेख का दावा सरकारी दस्तावेजों और ऐतिहासिक संदर्भों में किया गया है।
मोर्चा ने कहा कि पारसनाथ पहाड़ से जुड़े धार्मिक और ऐतिहासिक दावों का आकलन दस्तावेजी प्रमाण, स्थानीय परंपराओं और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
जैन समुदाय पर लगाया धनबल के इस्तेमाल का आरोप
मोर्चा ने जैन समुदाय के कुछ लोगों पर धनबल के जरिए सरकार और न्यायालय को कथित रूप से प्रभावित एवं गुमराह करने का आरोप लगाया। संगठन का दावा है कि ऐसी कोशिशों से संथाल आदिवासी समाज के मौलिक, पारंपरिक और प्रथागत अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि, ये आरोप मारंग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा की ओर से लगाए गए हैं। इस संबंध में विश्व जैन संगठन या जैन समुदाय की ओर से कोई पक्ष सामने आने की जानकारी नहीं है।
एकतरफा व्यवस्था की समीक्षा की मांग
मोर्चा ने केंद्र और राज्य सरकार से पारसनाथ पहाड़ को लेकर जैन समुदाय के पक्ष में जारी किसी भी एकतरफा आदेश या व्यवस्था की समीक्षा करने की मांग की है। संगठन ने न्यायालय के आदेशों और आदिवासी समाज के प्रथागत अधिकारों को ध्यान में रखते हुए संरक्षित पारसनाथ मारांङ बुरू क्षेत्र को संथाल आदिवासी समुदाय का प्राचीन एवं प्रमुख धार्मिक स्थल घोषित करने की मांग भी की।
संगठन का कहना है कि पारसनाथ पहाड़ से जुड़े विभिन्न समुदायों की आस्था का सम्मान करते हुए सरकार को बातचीत और सहमति के माध्यम से समाधान तलाशना चाहिए।
पहल नहीं हुई तो बड़े आंदोलन की चेतावनी
मारंग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा ने चेतावनी दी कि यदि केंद्र और राज्य सरकार ने जल्द सकारात्मक पहल नहीं की और आदिवासी संथाल समुदाय के पारंपरिक अधिकारों की अनदेखी जारी रही, तो व्यापक आंदोलन किया जाएगा।
संगठन ने कहा कि अपने धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाया जाएगा।
मोर्चा ने कहा कि पारसनाथ मारंग बुरू से जुड़े विवाद का समाधान किसी एक पक्ष के दावे के आधार पर नहीं होना चाहिए।
ऐतिहासिक दस्तावेजों, संवैधानिक प्रावधानों, न्यायालय के आदेशों और स्थानीय आदिवासी समाज की प्राचीन परंपराओं को ध्यान में रखते हुए सभी पक्षों से संवाद के बाद ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए।