जमशेदपुर : शहर के गोलमुरी स्थित सर्कस मैदान में राजधानी सर्कस दर्शकों के मनोरंजन का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। बीते शनिवार से शुरू हुए इस भव्य आयोजन को शहरवासियों का शानदार प्रतिसाद मिल रहा है। बच्चों से लेकर युवा और बुजुर्ग तक बड़ी संख्या में सर्कस देखने पहुंच रहे हैं और रोमांचक प्रस्तुतियों का भरपूर आनंद उठा रहे हैं।
सोमवार को आयोजित प्रेस वार्ता में सर्कस प्रबंधन ने बताया कि राजधानी सर्कस का आयोजन 16 अगस्त तक चलेगा। इस दौरान प्रतिदिन तीन शो आयोजित किए जाएंगे। हर शो में रोमांच, हास्य और आधुनिक मनोरंजन से भरपूर कई आकर्षक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाएंगे। आम लोगों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए टिकट की कीमत 100, 150 और 200 रुपये रखी गई है, ताकि हर वर्ग के लोग परिवार के साथ सर्कस का आनंद ले सकें।
प्रबंधन के अनुसार इस बार सर्कस में असम, मिजोरम समेत देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रशिक्षित कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। हवा में हैरतअंगेज स्टंट, संतुलन के रोमांचकारी करतब, जोकरों की हास्य प्रस्तुतियां और आधुनिक तकनीक से सजे विशेष कार्यक्रम दर्शकों को रोमांचित कर रहे हैं।
इस बार कई नए आकर्षण भी जोड़े गए हैं, जो हर आयु वर्ग के लोगों को पसंद आ रहे हैं। हालांकि उनका कहना था कि सर्कस के कारोबार में पहले जैसी आमदनी नहीं रही। अब इस व्यवसाय में काफी परेशानी हो रही है।
राजधानी सर्कस का उद्घाटन समाजसेवी चंद्रगुप्त सिंह ने फीता काटकर किया था। उद्घाटन समारोह में बड़ी संख्या में शहरवासी मौजूद रहे और कलाकारों की शानदार प्रस्तुतियों का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया।
सर्कस प्रबंधन ने शहरवासियों से अपील की है कि वे अपने परिवार और बच्चों के साथ गोलमुरी सर्कस मैदान पहुंचकर इस मनोरंजक आयोजन का आनंद लें। प्रबंधन का कहना है कि शुरुआती दिनों में ही दर्शकों का उत्साह उत्साहजनक रहा है और आने वाले दिनों में भी बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की उम्मीद है।
मनोरंजन की सदियों पुरानी परंपरा
सर्कस की शुरुआत आधुनिक रूप में 1768 में इंग्लैंड के घुड़सवार कलाकार फिलिप एस्टले ने की थी। उन्होंने घुड़सवारी के करतबों को मनोरंजन का रूप दिया, जिसे बाद में आधुनिक सर्कस की नींव माना गया। इसके बाद यूरोप और अमेरिका में सर्कस तेजी से लोकप्रिय हुआ और इसमें जोकर, रस्सी पर चलने वाले कलाकार, जिमनास्ट तथा विभिन्न प्रकार के स्टंट शामिल होते गए।
भारत में सर्कस का इतिहास 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से जुड़ा है। वर्ष 1880 में विष्णुपंत चात्रे ने देश के पहले संगठित भारतीय सर्कस की स्थापना की। इसके बाद ग्रेट रॉयल सर्कस, जेमिनी सर्कस, कमला सर्कस और राजधानी सर्कस जैसी कई प्रसिद्ध सर्कस कंपनियों ने देशभर में मनोरंजन की इस परंपरा को आगे बढ़ाया। समय के साथ पशुओं के प्रदर्शन पर कानूनी प्रतिबंध लगने के बाद भारतीय सर्कस ने आधुनिक तकनीक, मानव कौशल, स्टंट, संगीत, प्रकाश व्यवस्था और कलाबाजी को प्रमुख आकर्षण बनाकर खुद को नए दौर के अनुरूप ढाल लिया।