निखार सबलोक हत्याकांड ने सियासी संरक्षण पर उठाए गंभीर सवाल
जमशेदपुर की आबोहवा फिर गोलियों से दहल उठी है। चांडिल में होटल कारोबारी निखार सबलोक की हत्या हुई। वारदात होटल के बाहर दिनदहाड़े हुई। घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।
हालांकि, इस हत्याकांड ने राजनीतिक संरक्षण की बहस छेड़ दी है। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने प्रभावशाली लोगों की भूमिका पर सवाल उठाया। उनके अनुसार, ऐसे सहारे से अपराधी गिरोह मजबूत होते हैं।
दूसरी ओर, यह बयान व्यापक जांच की मांग करता है। सवाल केवल हमलावरों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। जांच को अपराध की पूरी कड़ी तक पहुंचना होगा।
निखार सबलोक का राजनीतिक हलकों से पुराना जुड़ाव बताया जाता रहा है। ऐसे में उनकी हत्या ने कई सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति की राजनीतिक निकटता अपराध का प्रमाण नहीं है।
वहीं, जांच एजेंसियों को हर कोण पर निष्पक्षता से काम करना होगा। अपराधियों के पीछे किसी प्रभावशाली व्यक्ति का हाथ है। यदि ऐसा है, तो उसे सामने लाना होगा।
इसके अलावा, पुलिस को केवल हथियार चलाने वालों तक नहीं रुकना चाहिए। हत्या की साजिश और उसके कारणों की भी जांच जरूरी है। धन, राजनीतिक संपर्क और आपराधिक नेटवर्क भी जांचे जाने चाहिए।
इसी बीच, जनता के मन में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। औद्योगिक शहर में लगातार अपराध गंभीर चिंता का विषय है। कारोबारी और आम नागरिक सुरक्षा चाहते हैं।
हालांकि, राजनीतिक बयानबाजी से जांच का रास्ता नहीं निकलता। इसके लिए मजबूत साक्ष्य और निष्पक्ष कार्रवाई चाहिए। किसी भी दल या व्यक्ति को जांच से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।
दूसरी ओर, राजनीतिक दलों की भी बड़ी जिम्मेदारी है। अपराधियों से किसी भी प्रकार की नजदीकी खत्म करनी होगी। चुनावी लाभ के लिए आपराधिक तत्वों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
वहीं, प्रशासन को भी अपनी जवाबदेही स्पष्ट करनी होगी। अपराधियों में कानून का भय पैदा करना जरूरी है। पुलिस की कार्रवाई निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए।
इसके बाद ही जनता का भरोसा मजबूत हो सकता है। वरना हर वारदात के बाद सवाल दोहराए जाते रहेंगे। अपराधी पकड़े जाएंगे, लेकिन संरक्षक बचते रहेंगे।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपराध केवल सड़क पर नहीं पनपता। उसे आर्थिक और राजनीतिक समर्थन भी मिल सकता है। इसलिए जांच को व्यापक बनाना जरूरी है।
हालांकि, किसी भी आरोप को तथ्य के बिना सच नहीं माना जा सकता। जांच में सामने आए प्रमाण ही अंतिम आधार होंगे। यही निष्पक्ष कानून व्यवस्था की बुनियादी शर्त है।
उधर, निखार सबलोक की हत्या ने व्यवस्था को चुनौती दी है। अब पुलिस के सामने बड़ी जिम्मेदारी है। उसे हत्यारों के साथ पूरी साजिश खोजनी होगी।
इसके अलावा, राजनीतिक नेतृत्व को भी आत्ममंथन करना होगा। अपराधियों से दूरी केवल बयान में नहीं दिखनी चाहिए। उसका असर व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।
वहीं, जनता यह जानना चाहती है कि अपराध का असली चेहरा कौन है। सवाल यह भी है कि अपराधियों को ताकत कहां से मिलती है। और क्या प्रभावशाली संरक्षण की कोई कड़ी मौजूद है?
अब जांच की दिशा इन सवालों का जवाब देगी। कार्रवाई निष्पक्ष हुई तो कई परतें खुल सकती हैं। लेकिन कार्रवाई अधूरी रही तो सवाल बने रहेंगे।
सवाल सीधा है। सफेदपोश संरक्षण की चर्चा कब खत्म होगी? अपराधियों के पीछे छिपे चेहरे कब सामने आएंगे? और कानून का खौफ कब लौटेगा?
