August 26, 2026
टाउन पोस्ट
सच्ची खबर, सही समय पर
जमशेदपुर

जमशेदपुर में झारखंड की विलुप्त होती लोककलाओं पर दो दिवसीय कार्यशाला, 100 प्रतिभागियों ने सीखी सोरा कला

जमशेदपुर में झारखंड की विलुप्त होती लोककलाओं पर दो दिवसीय कार्यशाला, 100 प्रतिभागियों ने सीखी सोरा कला

जमशेदपुर : झारखंड की पारंपरिक और विलुप्त होती लोककलाओं के संरक्षण एवं नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से डीबीएमएस कॉलेज ऑफ एजुकेशन में दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।

कॉलेज के कल्चरल क्लब की ओर से अबीरा आर्ट्स के सहयोग से आयोजित कार्यशाला में 21 और 22 अगस्त को विभिन्न महाविद्यालयों से आए करीब 100 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

कार्यशाला में प्रसिद्ध सोरा कला कलाकार और रिसोर्स पर्सन सोना राम सोरेन ने प्रतिभागियों को सोरा कला की पारंपरिक तकनीकों, बारीकियों और इसके सांस्कृतिक महत्व की जानकारी दी।

सोरा कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सोना राम सोरेन को कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं।

सोरा और सोहराय कला में अंतर बताया

सोना राम सोरेन ने प्रतिभागियों को सोरा और सोहराय कला के बीच अंतर भी समझाया। उन्होंने बताया कि सोरा कला में प्रकृति, पशु-पक्षियों और विभिन्न पारंपरिक प्रतीकों को प्रमुखता से चित्रित किया जाता है।

वहीं, सोहराय कला में मानव जीवन से जुड़े विषयों के साथ स्त्री-पुरुष की आकृतियों और सामाजिक-सांस्कृतिक भावनाओं को उकेरा जाता है।

उन्होंने कहा कि समय के साथ लोककलाओं में बदलाव और नए प्रयोग हुए हैं, लेकिन इनके मूल स्वरूप और पारंपरिक पहचान को संरक्षित रखना जरूरी है।

लोककलाएं महज चित्रकारी की विधा नहीं हैं, बल्कि इनमें समाज की स्मृतियां, परंपराएं, प्रकृति के साथ जुड़ाव और सांस्कृतिक पहचान समाहित होती है।

उन्होंने कहा कि इन कलाओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना सामूहिक जिम्मेदारी है, ताकि झारखंड की समृद्ध लोक और जनजातीय कला परंपराएं आने वाले समय में भी जीवित रहें।

प्रतिभागियों ने सीखा सोरा कला का व्यावहारिक प्रशिक्षण

कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को सोरा कला की पारंपरिक तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। प्रतिभागियों ने खुद कलाकृतियां तैयार कर इस लोककला को करीब से समझा और उसके रचनात्मक पक्ष का अनुभव किया।

इस अवसर पर अबीरा आर्ट्स की संस्थापक श्वेता सिंह भी मौजूद रहीं। अबीरा आर्ट्स की ओर से झारखंड की पारंपरिक और विलुप्त होती कलाओं के संरक्षण, स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन देने तथा युवाओं को इन कला विधाओं से जोड़ने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है।

कार्यशाला के समापन पर प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र और स्मृति-चिह्न प्रदान किए गए। कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. बी. चंद्रशेखर, श्रीमती श्रीप्रिया धर्मराजन, श्रीमती सुधा दिलीप, एडवाइजर एवं मेंटर डॉ. जूही समर्पिता, प्राचार्या डॉ. मोनिका उप्पल, वाइस-प्रिंसिपल श्रीमती पामेला घोष दत्ता और कल्चरल क्लब प्रमुख अमृता चौधरी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कॉलेज के शिक्षकों ने भी आयोजन में सक्रिय सहयोग दिया।

कार्यक्रम का संचालन रश्मि, औयोना, श्रद्धा टोपनो और आर्तिका ने किया। कार्यशाला का समापन झारखंड की लोक एवं जनजातीय कला परंपराओं को संरक्षित करने, नई पीढ़ी से जोड़ने और राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के संकल्प के साथ हुआ।

न्यूज़लेटर

हर सुबह की बड़ी खबरें, सीधे आपके इनबॉक्स में

टाउन पोस्ट का न्यूज़लेटर सब्सक्राइब करें — कोई स्पैम नहीं, बस ज़रूरी खबरें।

हम आपकी जानकारी को सुरक्षित रखते हैं। कभी भी अनसब्सक्राइब करें।

धन्यवाद! कृपया सब्सक्रिप्शन की पुष्टि के लिए अपना ईमेल जांचें।

Feel like reacting? Express your views here!

Discover more from Town Post

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading