August 6, 2026
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महान क्रांतिकारी से प्रखर राष्ट्रवादी विचारक तक, जानिए 28 मई को जन्मे वीर सावरकर के संघर्ष की गाथा

नई दिल्ली, 27 मई (आईएएनएस)। विनायक दामोदर सावरकर भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित, प्रभावशाली और विवादास्पद व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। महान क्रांतिकारी, चिंतक, लेखक, वकील, राजनीतिज्ञ और राष्ट्रवादी विचारक के रूप में पहचान बनाने वाले वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नाशिक जिले में हुआ था।

वीर सावरकर (विनायक दामोदर सावरकर) के पिता का नाम दामोदर पंत सावरकर और माता का नाम राधाबाई था। बचपन से ही उनका जीवन संघर्षों और कठिनाइयों से भरा रहा। जब वह मात्र नौ वर्ष के थे, तब उनकी माता का निधन हो गया, जबकि सात वर्ष बाद उनके पिता का भी देहांत हो गया। इसके बाद उनके बड़े भाई गणेश सावरकर ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाली।

वीर सावरकर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नासिक के शिवाजी हाई स्कूल से प्राप्त की और वर्ष 1901 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। पढ़ाई के साथ-साथ उनका झुकाव साहित्य की ओर भी था। उन्होंने कम उम्र में ही कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। वह उच्च शिक्षा के लिए लंदन भी गए।

लंदन में रहते हुए उनका रुझान राजनीतिक गतिविधियों की ओर तेजी से बढ़ा। वर्ष 1904 में उन्होंने ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन की स्थापना की। इस संगठन के माध्यम से उन्होंने युवाओं में स्वदेशी, राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति की भावना को जागृत करने का प्रयास किया। 1905 में हुए बंगाल विभाजन का उन्होंने खुलकर विरोध किया और पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन को नई दिशा दी।

रूसी क्रांतिकारियों से प्रभावित सावरकर ने 1907 में लंदन के इंडिया हाउस में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयंती मनाई। इसी दौरान उनका संपर्क कई क्रांतिकारी नेताओं से हुआ। वर्ष 1909 में मदन लाल ढींगरा द्वारा ब्रिटिश अधिकारी कर्जन वायली की हत्या के बाद सावरकर ब्रिटिश सरकार के निशाने पर आ गए। उन्होंने इस घटना के बाद ‘लंदन टाइम्स’ में लेख लिखा, जिसके चलते 13 मई 1910 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

गिरफ्तारी के बाद 8 जुलाई 1910 को उन्होंने भागने का प्रयास किया, लेकिन दोबारा पकड़े गए। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें दोहरे आजीवन कारावास की सजा सुनाई और अंडमान की सेलुलर जेल, जिसे ‘काला पानी’ कहा जाता था, उन्हें वहां भेज दिया। इसके बाद 7 अप्रैल 1911 को उन्हें पोर्ट ब्लेयर की सेलुलर जेल लाया गया, जहां 4 जुलाई 1911 से 21 मई 1921 तक उन्होंने कठोर यातनाएं झेलीं। हालांकि, बाद में उनकी याचिका पर विचार करते हुए अंग्रेजों ने उन्हें रिहा कर दिया।

वीर सावरकर ने 1857 के विद्रोह को भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताया। उन्होंने इस विषय पर विस्तृत शोध कर ‘1857 द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस’ नामक पुस्तक लिखी, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वीर सावरकर केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक प्रखर विचारक भी थे। उन्होंने अस्पृश्यता, सामाजिक भेदभाव और राष्ट्रीय एकता पर कई प्रेरणादायक विचार व्यक्त किए। उनका मानना था कि समाज में व्याप्त छुआछूत और विभाजन देश को कमजोर करते हैं। उन्होंने कर्तव्यनिष्ठा, संघर्ष और राष्ट्रप्रेम को जीवन का सबसे बड़ा धर्म बताया।

एसएकेडीकेपी

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