चार राज्यों में हाथी संरक्षण के लिए 500 करोड़ की क्षेत्रीय योजना
मृत्युंजय सिंह गौतम
जमशेदपुर : हाल के वर्षों में मानव-हाथी संघर्ष बढ़ा है। झारखंड सहित पड़ोसी राज्यों में घटनाएं सामने आती रही हैं। वहीं, हाथियों के गांवों तक पहुंचने से नुकसान भी बढ़ा है।
इसी बीच, जमशेदपुर सांसद विद्युत वरण महतो सहित कई जनप्रतिनिधियों ने मुद्दा उठाया है। उन्होंने केंद्र सरकार से इस संकट पर ध्यान देने की मांग की है।
अब केंद्र सरकार क्षेत्रीय स्तर पर बड़ी योजना तैयार कर रही है। झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ इसके दायरे में होंगे। हाथी संरक्षण के लिए करीब 500 करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं।
इसके तहत हाथी गलियारों को सुरक्षित किया जाएगा। वहीं, संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी। चारों राज्यों के बीच बेहतर समन्वय भी विकसित किया जाएगा।
हालांकि, हाथियों की आवाजाही राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रहती। एक राज्य का झुंड दूसरे राज्य में प्रवेश कर सकता है। इसलिए अलग-अलग रणनीतियों के बजाय साझा व्यवस्था जरूरी है।
गलियारे टूटे तो गांवों की ओर बढ़ते हैं हाथी
हाथी गलियारे उनके प्राकृतिक आवागमन के लिए जरूरी हैं। इन्हीं रास्तों से हाथी भोजन और पानी तलाशते हैं।
हालांकि, सड़क और रेल परियोजनाओं से रास्ते बाधित होते हैं। खनन और उद्योगों का विस्तार भी दबाव बढ़ाता है। दूसरी ओर, बस्तियों का विस्तार प्राकृतिक मार्गों को प्रभावित करता है।
ऐसे में हाथी वैकल्पिक रास्ते तलाशते हैं। कई बार ये रास्ते खेतों और गांवों से गुजरते हैं। इसके बाद फसलों और मकानों को नुकसान होता है।
झारखंड के लिए योजना का विशेष महत्व
झारखंड में हाथियों की आवाजाही कई वन क्षेत्रों में होती है। पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां इसके प्रमुख क्षेत्र हैं।
वहीं, चाकुलिया में संरक्षण प्रयासों को गति दी जा रही है। चांडिल क्षेत्र में भी हाथियों के लिए क्षेत्र विकसित करने की पहल है।
करीब 2000 हेक्टेयर क्षेत्र में एलीफेंट जोन विकसित करने की योजना है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक विचरण क्षेत्र सुरक्षित करना है।
इसके अलावा, जंगलों में भोजन और पानी की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर है। इससे हाथियों की गांवों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
जंगल में भोजन-पानी बढ़ाना जरूरी
मानव-हाथी संघर्ष के पीछे कई कारण हैं। जंगलों में भोजन और पानी की कमी उनमें प्रमुख है।
ऐसे में पसंदीदा वनस्पतियों का रोपण जरूरी है। प्राकृतिक वनस्पतियों का संरक्षण भी महत्वपूर्ण होगा।
इसके अलावा, जंगलों में तालाब और जलाशय विकसित किए जा सकते हैं। इससे हाथियों को जंगल के भीतर संसाधन मिलेंगे।
चार राज्यों का समन्वय बनेगा अहम कड़ी
हाथियों की गतिविधियों की जानकारी समय पर साझा करनी होगी। संवेदनशील इलाकों की संयुक्त निगरानी भी जरूरी होगी।
इसके अलावा, हाथियों के मार्गों का लगातार अध्ययन करना होगा। इससे संभावित संघर्ष वाले इलाकों की पहचान हो सकेगी।
वहीं, समय रहते ग्रामीणों को चेतावनी देना महत्वपूर्ण होगा। इससे वन विभाग को भी तैयारी का समय मिलेगा।
केवल मुआवजा समस्या का स्थायी समाधान नहीं
हाथियों से नुकसान के बाद मुआवजा तत्काल राहत देता है। हालांकि, इससे संघर्ष की मूल वजह खत्म नहीं होती।
यदि गलियारे बाधित रहेंगे तो समस्या बनी रहेगी। जंगलों में संसाधन कम होने पर दबाव भी बढ़ेगा।
इसलिए संरक्षण में कई स्तरों पर काम जरूरी है। गलियारा संरक्षण और आवास सुधार प्रमुख प्राथमिकताएं होनी चाहिए।
इसके अलावा, जलस्रोत और पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करनी होगी। ग्रामीण सुरक्षा को भी योजना में प्रमुख स्थान देना होगा।
शोध और तकनीक से निगरानी होगी मजबूत
हाथियों की आवाजाही का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। उनके आवास और व्यवहार का भी अध्ययन होना चाहिए।
वहीं, कैमरा निगरानी और आधुनिक तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। हाथियों की गतिविधियों पर समय रहते जानकारी मिल सकेगी।
इसके अलावा, प्रस्तावित मानव-हाथी संघर्ष अनुसंधान केंद्र उपयोगी हो सकता है। यहां आंकड़ों के आधार पर बेहतर रणनीति तैयार की जा सकेगी।
ग्रामीणों की सुरक्षा भी संरक्षण का हिस्सा
हाथी संरक्षण में ग्रामीणों की सुरक्षा जरूरी है। उनकी आजीविका की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
हालांकि, संवेदनशील गांवों में चेतावनी तंत्र मजबूत करना होगा। जरूरत पड़ने पर सुरक्षित निकासी की व्यवस्था भी जरूरी है।
वहीं, स्थानीय ग्रामीणों को संरक्षण से जोड़ना होगा। आदिवासी समुदायों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
विकास के साथ संरक्षण का संतुलन जरूरी
झारखंड में सड़क और रेल परियोजनाएं जरूरी हैं। खनन और औद्योगिक विकास भी आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा हैं।
हालांकि, परियोजनाओं की योजना बनाते समय हाथी गलियारों को बचाना होगा। प्राकृतिक आवागमन मार्गों की अनदेखी महंगी पड़ सकती है।
इसके अलावा, वन विभाग को अन्य विभागों के साथ काम करना होगा। सड़क, रेल, उद्योग और स्थानीय प्रशासन का समन्वय जरूरी है।
प्रस्तावित 500 करोड़ रुपये की योजना इसी दिशा में अहम कदम हो सकती है। हालांकि, इसकी सफलता प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।
हाथियों को गांवों से दूर रखने का रास्ता जंगलों से जुड़ा है। जंगल में पर्याप्त भोजन और पानी उपलब्ध कराना होगा।
इसके साथ ही सुरक्षित आवागमन मार्ग भी बचाने होंगे। तभी मानव-हाथी संघर्ष को लंबे समय में घटाया जा सकेगा।
चार राज्यों की साझा रणनीति इस प्रयास की अहम कड़ी होगी। वैज्ञानिक योजना और स्थानीय भागीदारी भी जरूरी होगी।
