Custodial Death : झारखंड हाईकोर्ट ने हिरासत में मौत के 262 मामलों में कानून तोड़ने पर हेमंत सरकार को लगाई फटकार

रांची: झारखंड में हिरासत में हुई मौतों के मामलों को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने हेमंत सोरेन सरकार पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने इन मामलों की जांच से जुड़े अनिवार्य कानूनी प्रावधानों का व्यवस्थित तरीके से उल्लंघन किया है। कोर्ट ने इसे “प्रणालीगत गैर-अनुपालन की बेहद दुखद और चौंकाने वाली तस्वीर” बताया।

427 हिरासत मौतों में 262 मामलों की गलत जांच

जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच राज्य में हिरासत में हुई 427 मौतों में से 262 मामलों की जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेटों द्वारा कराई गई। जबकि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत ऐसी जांच न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा कराना अनिवार्य है।

न्यायमूर्ति एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार के अपने आंकड़े ही कानून की मूलभूत समझ की कमी या उसकी खुली अवहेलना को दर्शाते हैं।

“दो दशक पहले ही कार्यपालिका से छीना गया था अधिकार”

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार यह दावा कर रही है कि सभी मामलों में मजिस्ट्रेट जांच हुई, लेकिन उसके द्वारा प्रस्तुत आंकड़े ही उसकी दलीलों का खंडन कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि 262 मामलों की जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेटों से कराई गई, जबकि यह अधिकार दो दशक पहले ही कार्यपालिका से वापस लेकर न्यायिक मजिस्ट्रेट को सौंप दिया गया था।

पीठ ने इसे कानून के व्यवस्थित उल्लंघन और प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण बताया।

प्रक्रियाओं के पालन में पूरी तरह विफल रही सरकार

हाईकोर्ट ने कहा कि हिरासत में मौत जैसे संवेदनशील मामलों में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए संसद ने विशेष कानूनी प्रक्रियाएं तय की हैं, लेकिन झारखंड सरकार उनका पालन करने में पूरी तरह विफल रही है। अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड संधारण और मामलों के प्रबंधन में राज्य की सत्यनिष्ठा और गंभीरता पर सवाल खड़े होते हैं।

प्रधान जिला न्यायाधीशों और गृह विभाग से रिपोर्ट तलब

अदालत ने सभी प्रधान जिला न्यायाधीशों तथा गृह, कारागार एवं आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव को छह महीने के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि 262 मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट से जांच क्यों नहीं कराई गई।

साथ ही कोर्ट ने यह भी पूछा कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने की सिफारिश क्यों न की जाए।

“चुनिंदा” तरीके से मामलों के आवंटन पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की उस प्रक्रिया पर भी नाराजगी जताई, जिसमें कुछ मामलों को न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजा गया जबकि अन्य मामलों की जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेटों को सौंप दी गई। अदालत ने इसे “चुनिंदा पद्धति” करार देते हुए पारदर्शिता पर सवाल उठाए।

गृह विभाग को जिलावार सूची तैयार करने का आदेश

खंडपीठ ने गृह विभाग को निर्देश दिया कि 2018 से अब तक हिरासत में हुई उन सभी मौतों की जिलावार सूची दो महीने के भीतर तैयार की जाए, जिनकी जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेटों ने की थी।

इसके अलावा मुख्य सचिव और गृह विभाग के प्रधान सचिव को 30 दिनों के भीतर सभी जिला मजिस्ट्रेटों और पुलिस अधीक्षकों को स्पष्ट निर्देश जारी करने को कहा गया है कि हिरासत मौत की जांच का अधिकार केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास है।

पीड़ित परिवारों को राहत देने का निर्देश

हाईकोर्ट ने जिला पीड़ित मुआवजा समितियों को भी निर्देश दिया कि हिरासत में हिंसा, लापरवाही या अप्राकृतिक मौत से जुड़े मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर मुआवजे पर विचार करें। अदालत ने कहा कि पीड़ित परिवारों को लंबे मुकदमों में उलझाने के बजाय उन्हें समय पर राहत मिलनी चाहिए।

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